राहुल गांधी : क्या ये गांधी परिवार की राजनीति का अंत है?

- गीता पांडेय
गुरुवार को जब भारतीय आम चुनावों के नतीजे आए तो नरेंद्र मोदी इकतरफ़ा जीत के साथ विजेता के तौर पर उभरे। दूसरी ओर नेहरू-के उत्तराधिकारी और भारतीय राष्ट्रीय के अध्यक्ष राहुल गांधी एक पस्त, पराजित और हताश नेता के रूप में उभरे।
वो एक परम राजनीतिक वंश के मुख्य उत्तराधिकारी हैं। उनके परनाना, जवाहर लाल नेहरू भारत के पहले और सबसे ज़्यादा समय तक रहे प्रधानमंत्री हैं। उनकी दादी इंदिरा गांधी भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं और उनके पिता राजीव गांधी भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री थे।

साल 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने अपनी सबसे बुरी हार देखी थी। लेकिन गुरुवार को आए नतीजे राहुल गांधी के लिए दोहरा झटका लेकर आए। कांग्रेस सिर्फ़ 52 सीटें ही जीत सकीं। उनके मुकाबले में मोदी की भाजपा ने 300 से ज़्यादा सीटें जीतीं। इससे भी बुरा ये हुआ कि राहुल गांधी अपनी खानदानी सीट अमेठी भी हार बैठे। हालांकि राहुल गांधी इस बार भी संसद में बैठेंगे क्योंकि वो केरल की वायनाड सीट से भी खड़े हुए थे और यहां से वो जीत गए हैं।
लेकिन अमेठी सम्मान की लड़ाई भी थी। इस सीट से उनके दोनो अभिभावक- मां सोनिया गांधी और पिता राजीव गांधी ने चुनाव लड़ा और जीता। वो स्वयं यहां से पंद्रह सालों से सांसद थे। राहुल गांधी ने अमेठी के प्रत्येक घर में एक विशेष पत्र भी भेजा था जिस पर लिखा था मेरा अमेठी परिवार। बावजूद उसके उन्हें शर्मनाक नतीजे का सामना करना पड़ा। अभिनेत्री से राजनेता बनीं बीजेपी की केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी ने उन्हें करारी शिकस्त दी।
अमेठी उत्तर प्रदेश के दिल सी है। उत्तर प्रदेश भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है और दिल्ली की सत्ता का रास्ता यहीं से होकर जाता है। ये भारतीय राजनीति का ग्राउंड ज़ीरो भी हैं जहां किए गए प्रयोगों का असर पूरे देश में दिखाई भी देता है। आमतौर पर ये माना जाता रहा है कि जो यूपी जीतता है वही देश पर राज करता है।

भारत में हुए चौदह प्रधानमंत्रियों में से आठ यहीं से आए जिनमें राहुल गांधी के परनाना, दादी और पिता भी यहीं से जीते और प्रधानमंत्री बनें। 543 सांसदों की भारतीय संसद में से 80 सांसद यहीं से चुने जाते हैं। मूल रूप से गुजरात के नरेंद्र मोदी ने भी साल 2014 में यूपी की ही वाराणसी सीट का प्रतिनिधित्व किया और इस बार भी वो यहीं से सांसद चुने गए हैं।
किसी को ये उम्मीद तो नहीं थी कि कांग्रेस लोकसभा चुनावों में सीधी जीत हासिल कर लेगी लेकिन ये माना जा रहा था कि कांग्रेस पहले से बेहतर तो करेगी ही। यही वजह है कि नतीजों ने पार्टी के लोगों के अलावा आम लोगों को भी चौंका दिया है।

राहुल गांधी भले ही संसद में रहे लेकिन अब ये सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या ये कांग्रेस में गांधी युग का अंत है। या क्या पार्टी को फिर से पुनर्जीवित करने के लिए गांधी परिवार की राजनीति को ख़त्म ही कर दिया जाए।
हार के बाद राहुल गांधी ने पत्रकारों को संबोधित किया और हार की पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली। उन्होंने हार स्वीकार करते हुए बीजेपी को मिले जनादेश का सम्मान किया। अमेठी में वोटों की गिनती पूरी भी नहीं हुई थी। तीन लाख वोट और गिने जाने बाकी थे लेकिन उन्होंने हार स्वीकार करते हुए स्मृति से कहा- अमेठी का ख्याल रखना। मैं उन्हें मुबारकबाद देता हूं। वो जीत गई हैं। ये प्रजातंत्र हैं और मैं लोगों के फ़ैसले का सम्मान करता हूं।
कांग्रेस की हार पर उन्होंने ज़्यादा बात नहीं की। उन्होंने कहा कि कहां ग़लती हुई इस बात पर चर्चा कांग्रेस की वर्किंग कमेटी की बैठक में की जाएगी। उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि उम्मीद न हारें। उन्होंने कहा, डरने की ज़रूरत नहीं है, हम मेहनत करते रहेंगे और अंततः जीत हमारी ही होगी।

लेकिन लखनऊ में कांग्रेस के दफ़्तर में बैठकर टीवी से चिपककर कांग्रेस का 'कत्ल-ए-आम', जिसमें एक बाद एक कई बड़े नेता अपनी सीटें हारते जा रहे थे, देख रहे चुनिंदा कार्यकर्ताओं के राहुल गांधी की भविष्य की ये जीत दूर की कौड़ी दिखाई देती है।
पार्टी के एक नेता ने कहा, हमारी विश्वसनीयता बहुत घट गई है। लोगों को हमारे वादों पर भरोसा नहीं है। हम जो कह रहे हैं, उस पर वो विश्वास नहीं कर रहे हैं। मोदी ने लोगों से जो वादे किए पूरे नहीं किए लेकिन फिर भी लोग मोदी का भरोसा करते हैं। मैंने उनसे पूछा कि ऐसा क्यों हैं? उन्होंने कहा, हमें भी नहीं पता कि ऐसा क्यों हैं!

चुनावी राजनीति में कांग्रेस के इस बेहद ख़राब प्रदर्शन से राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने तय हैं और बहुत से विश्लेषक नेतृत्व बदलाव की बात भी करने लगे हैं। अध्यक्ष पद से उनका इस्तीफ़ा तक मांगा जा रहा है। लेकिन इस तरह की सभी मांगें पार्टी के बाहर से उठ रही हैं और पार्टी नेतृत्व इन्हें नकार ही देगा।
दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा भी चली कि राहुल गांधी ने इस्तीफ़ा देने की पेशकश की है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने बीबीसी से कहा, कांग्रेस अपने नेतृत्व पर सवाल नहीं करेगी और अगर राहुल गांधी ने इस्तीफ़ा दिया भी तो उसे स्वीकार नहीं किया जाएगा। अय्यर ने कहा कि पार्टी की हार के लिए नेतृत्व ज़िम्मेदार नहीं है। उन्होंने कहा, हार के कारण अन्य हैं जिन पर हमें काम करना होगा।
लखनऊ में पार्टी के प्रवक्ता ब्रिजेंद्र कुमार सिंह समझाते हुए कहते हैं कि समस्या पार्टी का नेतृत्व नहीं है बल्कि अंदरुनी लड़ाई और ग़लत चुनावी मुद्दे चुनना हैं। पार्टी के ढांचे में कुछ कमज़ोरियां हैं। नेताओं में अंदरुनी लड़ाई भी है। ज़मीन पर हमारा चुनावी अभियान भी देरी से शुरू हुआ। हमारे प्रयास, भले ही नाकाम रहे, लेकिन यूपी और बिहार में क्षेत्रीय दलों के साथ मिलना एक ख़राब विचार था।
कांग्रेस के नेताओं ने अभी तक इस हार के लिए राहुल गांधी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया है बल्कि वो इसके लिए पार्टी के ढांचे और चुनाव अभियान को ज़िम्मेदार ठहराते हैं।

व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा?
निजी बातचीत में कांग्रेस के कई विश्लेषक ये भी मान लेते हैं कि मोदी के सामने व्यक्तित्व की स्पर्धा में राहुल गांधी हार रहे थे। ब्रांड मोदी उनके रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट था।
सिंह कहते हैं, प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले चुनावों में जो वादे किए थे भले ही वो उन्हें पूरा करने में नाकाम रहे हे बावजूद इसके वो अपनी सरकार की नीतियों के बारे में लोगों को भरोसे में लेने में कामयाब रहे। ये पहली बार नहीं है जब मोदी के हाथों राहुल गांधी को इतनी बुरी हार मिली हो। 2014 के चुनावों में पार्टी को सिर्फ़ 44 सीटें ही मिली थी। लेकिन उस वक़्त भी राहुल को पूरी तरह ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया था।
कांग्रेस में कोई भी हार का ठीकरा राहुल के सिर फोड़ने को तैयार नहीं है
इसके बाद हुए कई विधानसभा चुनावों में कई राज्यों में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। राहुल की ये कहकर आलोचना की गई कि वो ज़मीनी हक़ीक़त से दूर हैं और उन्हें कुछ भी नहीं पता है। सोशल मीडिया पर उन्हें पप्पू तक कहा गया, उनके मीम्स बनाए गए और वो हंसी का पात्र बनकर रह गए।
एक सामान्य परिवार से आने वाले नरेंद्र मोदी राहुल गांधी के वंश को लेकर उन पर लगातार निशाना साधते रहे। वो उन्हें अपनी रैलियों में नामदार कहकर संबोधित करते रहे। मोदी जनता को समझाते कि राहुल गांधी शीर्ष पर अपनी योग्यता के बल पर नहीं बल्कि अपने पारिवारिक संबंधों की वजह से पहुंचे हैं।

निजी बातचीत में कांग्रेस के कई कार्यकर्ता राहुल गांधी को एक ऐसा सरल व्यक्ति बताते हैं जिसके पास अपने चालाक प्रतिद्वंद्वी से निबटने की न इच्छा है और न ही चालाकी। तो क्या इसे सिर्फ़ राहुल गांधी की नाकामी माना जाए या गांधी ब्रांड की नाकामी?
भारतीय राजनीति में चमकते रहे नेहरू-गांधी नाम की चमक हाल के सालों में कुछ फीकी पड़ी है। ख़ासकर शहरी मतदाताओं और युवाओं ने इस नाम को ख़ारिज कर दिया है। नेहरू और इंदिरा गांधी के कार्यकला की उपलब्धियां उनके लिए अब कोई मायने नहीं रखते हैं।

वो कांग्रेस को साल 2004-2014 के शासनकाल से आंकते हैं। इस दौरान कांग्रेस के नेतृत्व की गठबंधन सरकार पर भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप लगे। गुरुवार के नतीजों से लगता है कि कांग्रेस पर लगे ये आरोप अभी भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा हैं और वो उसे इसी नज़रिए से देखते हैं। राहुल गांधी अपने नज़रिए से भी आम मतदाताओं को नहीं जोड़ पाए।
गांधियों का पुनर्जन्म
लेकिन पार्टी के लोग राहुल गांधी या उनके नाम को हार के लिए ज़िम्मेदार नहीं मानते हैं। पार्टी के एक कार्यकर्ता सलाह देते हैं कि राहुल गांधी को किसी अमित शाह जैसे सहयोगी की ज़रूरत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी सहयोगी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को गुजरात और देश में बीजेपी की जीत की रणनीति बनाने का श्रेय दिया जाता रहा है।

ऐसा लगता नहीं है कि कांग्रेस के कार्यकर्ता सार्वजनिक तौर पर इस हार के लिए राहुल गांधी को ज़िम्मेदार बताएंगे। यदि भूतकाल को संकेत माना जाए तो वो राहुल के पीछे खड़े ही नज़र आएंगे। बीते दो सालों में राहुल के करियर ग्राफ़ में कुछ सुधार भी हुआ है। वो साये से निकलकर बाहर आए और उनके राजनीतिक व्यवहार में भी खुलापन आया। सोशल मीडिया पर उनका अभियान पहले से बेहतर हुआ और सरकार के नोटबंदी के विवादित फ़ैसले, रोज़गार की कमी, देश में बढ़ती असहिष्णुता और कमज़ोर होती अर्थव्यवस्था पर मज़बूती से अपने तर्क रखे।
ये देखा गया कि अपने आक्रामक अभियान से वो एजेंडा निर्धारित कर रहे हैं और बीते साल दिसंबर में जब राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में वो अपनी पार्टी को सरकार बनाने की स्थिति में ले आए तो कई को लगा कि वो अपनी पार्टी को फिर से गिनती में ले आए हैं। और इसी साल फ़रवरी में जब उनकी बहन प्रियंका गांधी ने औपचारिक रूप से राजनीति में क़दम रखा तो लगा कि गांधी कुछ करने जा रहे हैं।

कुछ कांग्रेसी समर्थक ऐसे भी हैं जिन्हें विश्वास है कि प्रियंका वो गांधी हैं जो इस राजनीतिक परिवार को बचा सकती हैं। कारण चाहे जो भी हों लेकिन प्रियंका राजनीतिक मशाल को थामने से कतराती रहीं थीं। प्रियंका और राहुल एक-दूसरे के काफ़ी करीबी हैं और राहुल को बाहर करने की किसी योजना में प्रियंका का शामिल होना बहुत संभव नहीं है। लेकिन ऐसा हो सकता है कि वो राहुल के साथ काम करने और उनका समर्थन करने में पहले से बड़ी भूमिका निभाएं।
अंततः कांग्रेस से इसे पार्टी की व्यापक विचारधारा की नाकामी ही मान रही है। जिस नए भारत को मोदी ने परिभाषित किया है और जिसकी नब्ज़ को उन्होंने पकड़ा है उसे समझने में और उससे जुड़ने में कांग्रेस नाकामयाब रही है।

पार्टी के पदाधिकारी वीरेंद्र मदान कहते हैं, अगर आप हमारा घोषणा पत्र देखो तो ये सबसे अच्छा घोषणापत्र है। जो नीतियां हमने घोषित की, जो वादे हमने किए वो बेहतरीन थे। लेकिन हमने मतदाताओं से जिस सहयोग और समर्थन की उम्मीद की वो हमें नहीं मिला।
मदान के मुताबिक दिल्ली में और प्रदेश में पार्टी नेतृत्व जल्द ही बैठक कर हार के कारणों की समीक्षा करेगा। ये आत्मावलोकन का समय है। कहां गलती हुई ये पता लगाने का समय है। वो कहते हैं कि नतीजे भले ही कितने ही ख़राब रहे हैं, पार्टी के नेतृत्व के साथ न खड़े रहने का सवाल ही नहीं उठता है।

मदान कहते हैं, सिर्फ़ राहुल गांधी ही नहीं हारे हैं। कई और बड़े नेता नहीं जीत पाए हैं। चुनाव आते जाते रहते हैं। आप कुछ जीतते हैं कुछ हारते हैं। 1984 को याद कीजिए, बीजेपी की सिर्फ़ दो सीटें आईं थीं। क्या उन्होंने वापसी नहीं की है? हम भी वापसी करेंगे?

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