पुतिन का रिजर्व सैनिकों को लामबंद करने का एलान यूक्रेन के लिए कितनी बड़ी चिंता

BBC Hindi| पुनः संशोधित शुक्रवार, 23 सितम्बर 2022 (07:45 IST)
लॉरेंस पीटर, बीबीसी न्यूज़
के राष्ट्रपति व्लादिमीर ने में मौजूद अपनी सेना को मज़बूत करने के लिए तीन लाख रिज़र्व सैनिकों को लामबंद करने का एलान किया है। उनका यह आदेश हाल में कई जगहों पर यूक्रेन की सेना से शिकस्त मिलने के बाद आया है।
 
व्लादिमीर पुतिन ने अपनी जनता को संबोधित करते हुए पश्चिम के ताक़तवर देशों पर आरोप लगाया कि वो रूस के 'टुकड़े-टुकड़े' करने की लगातार धमकियां दे रहे हैं।
 
उन्होंने नेटो को चेतावनी देते हुए कहा कि परमाणु क्षमता से लैस रूस पश्चिम के किसी भी 'परमाणु ब्लैकमेल' से निपटने के लिए अपने शस्त्रागार में मौजूद किसी भी हथियार का उपयोग कर सकता है।
 
उनका यह बयान पूर्वी और दक्षिणी यूक्रेन के क़ब्ज़े वाले चार इलाक़ों में तथाकथित जनमत संग्रह कराने के एलान के एक दिन बाद आया है। यह जनमत संग्रह इस हफ़्ते शुरू होने वाला है। 2014 में ऐसी ही पहल के बाद क्राइमिया को रूस ने अपने नियंत्रण में ले लिया था।
 
सेना को लामबंद करने के फै़सले के मायने
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने जिन तीन लाख रिज़र्व सैनिकों को लामबंद करने का एलान किया है उनमें सेना से रिटायर हो चुके जवान और अधिकारी भी हैं जिनमें से कुछ की उम्र 60 साल से अधिक भी है। सैद्धांतिक रूप से रूस लगभग 2.5 करोड़ लोगों को सैन्य सेवा के लिए लामबंद कर सकता है। हालांकि इस पर अभी विचार नहीं किया जा रहा है।
 
राष्ट्रपति पुतिन और रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगु, दोनों ने ये स्पष्ट किया कि 'अनिवार्य सैन्य सेवा' के तहत मिलिट्री ट्रेनिंग लिए लोगों को यूक्रेन में लड़ने के लिए नहीं भेजा जाएगा। रक्षा मंत्री शोइगु ने कहा कि लगभग 1,000 किलोमीटर की सीमा की सुरक्षा के लिए इन अतिरिक्त सैनिकों की ज़रूरत है।
 
पुतिन ने बताया कि यह तैनाती महीनों तक चलेगी। उन्होंने कहा कि रूस लंबी लड़ाई के लिए तैयार है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यह सैनिकों की सबसे बड़ी तैनाती है। हालांकि रूस ने 1980 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान और बाद में चेचन्या में लड़ने के लिए अपने हज़ारों सैनिकों को भेजा था।
 
लंबी अवधि तक चले उन ख़र्चीले युद्धों में कई सैनिक मारे गए थे, ये वो सैनिक थे जिनकी 'अनिवार्य सैन्य सेवा' के तहत ट्रेनिंग हुई थी। इस बार देश में युद्ध विरोधी भावना के फैलने से बचने के लिए रूस विशेष तौर पर चिंतित है।
 
पुतिन ने क्या एलान किया था?
-राष्ट्रपति पुतिन ने यूक्रेन में 'विशेष सैन्य अभियान' के लिए आंशिक रूप से रिज़र्व सैनिकों को लामबंद करने की घोषणा की।
-पुतिन ने कहा कि रूस के क़ब्ज़े वाले इलाकों के लोगों की सुरक्षा और इलाकाई अखंडता के लिए यह क़दम आवश्यक।
-पुतिन ने पश्चिम पर परमाणु हथियारों को लेकर ब्लैकमेल करने का आरोप मढ़ा।
-पुतिन ने कहा, "रूस के पास 'बहुत से जवाबी हथियार' हैं और ये कोई धौंस नहीं है।"
-सैन्य अनुभव वाले 3,00,000 लोगों को बुलावा- रक्षा मंत्री सर्गेई शोइगु।
-एक अनुमान के मुताबिक़, रूस में 20 लाख सैन्य रिज़र्व है। ये वो लोग हैं जिन्होंने अनिवार्य सैन्य सेवा के तहत मिलिट्री ट्रेनिंग ले रखी है। रूस में सैन्य प्रशिक्षण लेना अनिवार्य है।
 
रूसी सेना क्या यूक्रेन से अधिक ताक़तवर है?
संख्या के लिहाज से रूस की सेना यूक्रेन की सेना पर भारी पड़ती है, लेकिन पश्चिमी देशों से यूक्रेन को मिले आधुनिक हथियारों और बेहतर युद्ध रणनीति के कारण यह अंतर कम हो गया है।
 
रूस ने फ़रवरी में जब यूक्रेन पर हमला किया तब उसने डोनबास इलाक़े में रूस समर्थित कई हज़ार लड़ाकों के अलावा उसने 1.9 लाख सैनिकों की तैनाती की थी।
 
रूस ने बड़े वित्तीय प्रलोभन के साथ सेना में भर्ती का बड़ा अभियान चलाया। सेना में अतिरिक्त सैनिक शामिल हुए, ख़ास कर सर्बिया और कॉकेशस जैसे पिछड़े इलाकों से। इनमें चेचन लड़ाके भी शामिल हैं।
 
रूस की सेना का सामान्य आकार 10 लाख से थोड़ा अधिक है। वहीं लगभग 9 लाख सिविल स्टाफ हैं। हालांकि राष्ट्रपति पुतिन ने पिछले हफ़्ते 1.37 लाख अतिरिक्त सैनिकों की भर्ती के आदेश पर हस्ताक्षर किए हैं।
 
रूस में 18 से 27 साल आयुवर्ग के पुरुषों को एक साल की 'अनिवार्य सैन्य सेवा' करनी होती है। हालांकि स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करने वालों को ऐसा करने से छूट मिलती है। छात्र भी इससे बाहर हैं।
 
रूस ने शुरू में इस 'अनिवार्य सैन्य सेवा' किए लोगों को यूक्रेन भेजने से इनकार किया था, लेकिन 'अनिवार्य सैन्य सेवा' किए इन लोगों में से कइयों से जबरन अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाए जाने के मामले सामने आए। फिर इससे जुड़े अधिकारियों पर कार्रवाई भी की गई। फिर राष्ट्रपति पुतिन ने ये स्पष्ट किया कि इस युद्ध में 'अनिवार्य सैन्य सेवा' के तहत प्रशिक्षित सैनिकों को नहीं भेजा जाएगा।
 
उधर, रूस के हमले के पहले यूक्रेन के सैनिकों की संख्या बहुत कम क़रीब 1.96 लाख थी। लेकिन कीएव ने बड़ी संख्या में लामबंदी के आदेश दिए तो उससे सैनिकों की संख्या बढ़ गई।
 
रूस ने क्यों बदला पुराना फ़ैसला?
पश्चिम के विश्लेषकों और नेताओं के मुताबिक़, उत्तर खारकीएव इलाक़े में यूक्रेन ने बड़े जवाबी हमले किए जिससे रूस बैकफुट पर आ गया और उसके बाद ही पुतिन ने ये ताज़ा फै़सला लिया है।
 
रूस के रक्षा मंत्री शोइगु ने बुधवार को बताया कि इस युद्ध में अब तक 5,937 रूसी सैनिक मारे गए हैं। ये ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय के जून में 25,000 सैनिकों के मारे जाने के दावे और यूक्रेन के 50 हज़ार रूसी सैनिकों के मारे जाने के दावे से कहीं कम है।
 
ये भी सामने आया है कि चूंकि रूस को बड़ा नुक़सान हो रहा है तो वो इस युद्ध के लिए क़ैदियों को भी भर्ती कर रहा है। 1979 से 1989 के बीच अफ़ग़ानिस्तान की लड़ाई में सोवियत संघ के लगभग 15,000 सैनिक मारे गए थे।
 
बीबीसी रूस के पास इस बात के प्रमाण हैं कि यूक्रेन के साथ लड़ाई में अब तक 1,000 से अधिक वरिष्ठ अधिकारी मारे जा चुके हैं जिनमें कई पायलट, इंटेलिजेंस विशेषज्ञ और स्पेशल फ़ोर्सेज़ के अधिकारी शामिल हैं।
 
पुतिन क्या परमाणु हमले की धमकी दे रहे हैं?
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रूस विरोधी 'ख़तरा' बताते हुए यूक्रेन का समर्थन कर रहे पश्चिमी देशों की आलोचना की है। उन्होंने चेतावनी दी कि रूस की अखंडता के सामने जो भी ख़तरा आएगा, उससे हर संभव हथियारों से निपटा जाएगा।
 
उन्होंने कहा, "हमारे पास भी कई विनाशकारी हथियार हैं। इनमें से कुछ तो नेटो की तुलना में भी अत्याधुनिक हथियार हैं। ये कोई 'धौंस' नहीं है।"
 
रूस के सैन्य सिद्धांत के मुताबिक़, परमाणु हथियार तभी इस्तेमाल किए जाएंगे जब रूस बतौर एक देश ख़तरे में होगा।
 
रूस पहले ही यूक्रेन में लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइलों का इस्तेमाल कर चुका है। ये मिसाइलें 6,000 किलोमीटर प्रति घंटे से भी तेज़ गति से मार कर सकती हैं। हालांकि विश्लेषकों का कहना है कि वो मिसाइलें गेम चेंजर साबित नहीं हुईं।
 
अगर विवादास्पद 'जनमत संग्रह' के बाद रूस ये दावा करता है कि यूक्रेन के और इलाक़े उसका हिस्सा बन गए हैं तो अनुमान लगाया जा रहा है कि वह ये भी कह सकता है कि रूस पर नेटो का हमला हो सकता है।
 
यूक्रेन और पश्चिमी देशों का मानना है कि यह 'जनमत संग्रह' यूक्रेन की ज़मीन हड़पने का एक बहाना है। यूक्रेन में अमेरिका के राजदूत ब्रिगेट ब्रिंक ने कहा कि 'जनमत संग्रह का दिखावा' और 'सैनिकों की लामबंदी' रूस की कमज़ोरी के संकेत हैं।
 
नीदरलैंड्स के प्रधानमंत्री मार्क रूट ने जनमत संग्रह और रिज़र्व सैनिकों की लामबंदी को रूस की "घबराहट का संकेत" बताया। उन्होंने कहा, "परमाणु हथियारों पर उनके इस बयान को हम पहले भी कई बार सुन चुके हैं।" पश्चिमी देशों के कई अन्य नेताओं ने भी परमाणु हमले के ख़तरे से इनकार किया है।

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