किसान आंदोलन: सिंघु बॉर्डर पर प्रदर्शन कर रहे किसानों को नये साल से क्या उम्मीदें हैं?

BBC Hindi| पुनः संशोधित शुक्रवार, 1 जनवरी 2021 (15:26 IST)
रूपा झा, बीबीसी में भारतीय भाषाओं की प्रमुख
मोदी सरकार के नये कृषि क़ानूनों की मुख़ालफ़त कर रहे हरियाणा-पंजाब के किसानों को नये साल से बहुत उम्मीदें हैं। किसानों को प्रदर्शन करते हुए महीना भर से अधिक हो चुका है, केंद्र सरकार से जारी बातचीत में उन्हें अब तक कोई बड़ी सफलता हाथ नहीं लगी है, पर उन्हें विश्वास है कि जीत उन्हीं की होगी।
 
किसानों की प्रमुख माँग अब यह है कि 'सरकार उन्हें बताये कि वो तीनों कृषि क़ानूनों को कैसे रद्द करने वाली है।' संगठन चाहते हैं कि तीनों क़ानून वापस लिये जायें। इन क़ानूनों को किसान 'काले क़ानून' कह रहे हैं।
अपनी माँगों को लेकर किसान संगठन दिल्ली की सीमाओं पर डटे हुए हैं।

दिसंबर-जनवरी की ठण्ड में, जब न्यूनतम तापमान 3-5 डिग्री तक जा रहा है, जो खुले में शून्य से भी ज़्यादा ठण्डा महसूस होता है, ऐसी परिस्थिति में किसानों ने दिल्ली की सीमा पर एक 'टेंट सिटी' बना ली है।

इस 'टेंट सिटी' (सिंघु बॉर्डर) में जैसे-जैसे रात गहराती है, तापमान तेज़ी से गिरता है, मगर अलाव और प्रदर्शन में शामिल लोगों की गर्मजोशी इसके असर को महसूस नहीं होने देती।
 
साल 2020 हमेशा-हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गया है। यह साल ना सिर्फ़ कोरोना महामारी की वजह से, बल्कि भारतीय किसानों के एक अनुशासित और व्यवस्थित आंदोलन की वजह से भी बहुत यादगार रहेगा। हाल के दौर में लोगों ने भारत में ऐसा आंदोलन देखा नहीं होगा।

गुरुवार-शुक्रवार की दरमियानी रात, जब सारी दुनिया साल 2020 को विदा कर रही थी और नये साल का स्वागत कर रही थी, तो सड़कों पर मौजूद किसानों ने कैसे नया साल मनाया, यह जानने के लिए हम पहुँचे।

हमें बताया गया कि प्रदर्शन में शामिल लोगों ने यह तय किया है कि वो नये साल की आमद का जश्न नहीं मनायेंगे क्योंकि उनके बहुत सारे किसान साथी इस आंदोलन के दौरान मारे गये हैं। किसान उन्हें 'शहीद' कहते हैं। लेकिन यहाँ मौजूद किसानों को नए वर्ष से, आने वाले वक़्त से, बहुत सारी उम्मीदें हैं।
 
ये उम्मीदें किस तरह की हैं? आने वाले वक़्त में वो क्या देख रहे हैं? और क्या उन्हें प्रदर्शन में रहते-रहते कभी कोई नाउम्मीदी होती है? इस तरह के कुछ सवाल हमने प्रदर्शन में शामिल लोगों से किये।

'यह हर वर्ग का संघर्ष है'
को अपना समर्थन देने पहुँचीं रुपिंदर कौर कहती हैं कि "यह संघर्ष सिर्फ़ किसानों का संघर्ष नहीं है, बल्कि हर वर्ग का संघर्ष है।"
 
रुपिंदर कौर मोहाली (पंजाब) की रहने वाली हैं और पेशे से असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं। वो कहती हैं, "यह हमारे अस्तित्व का संघर्ष है। हर वर्ग का संघर्ष है और नये साल में हम सभी को निर्भीक बनने का संदेश देंगे।"
 
नये साल के आगमन से एक दिन पहले किसान नेताओं ने लोगों से यह अपील की थी कि वो अधिक से अधिक संख्या में उन जगहों पर पहुँचें जहाँ आंदोलन चल रहे हैं। उन्होंने आह्वान करते हुए कहा था कि "किसान अपना घर छोड़कर आये हैं और सड़कों पर हैं। नए साल पर उनके साथ आइये।"
 
रुपिंदर कौर जैसे बहुत से लोग जो ख़ुद किसान नहीं हैं, पर किसानों के आंदोलन के साथ हैं, वो नये साल के मौक़े पर प्रदर्शन स्थल पर दिखाई दिये।
 
नवंबर के अंतिम सप्ताह में हरियाणा से होते हुए पंजाब के किसान दिल्ली की सीमाओं तक पहुँचे थे। इसके बाद हरियाणा और फिर उत्तर प्रदेश के किसान भी अलग-अलग मोर्चों पर शामिल हुए। अब इन किसानों को आंदोलन करते महीना भर से अधिक हो गया है।
 
लोगों के सहयोग से सिंघु बॉर्डर जैसे प्रदर्शन स्थलों पर कुछ बुनियादी सुविधाएं तो इन किसानों को मिल रही हैं, लेकिन मौसम की वजह से परिस्थितियाँ वाक़ई मुश्किल हैं। ख़ासतौर से प्रदर्शन में शामिल बुज़ुर्गों और महिलाओं के लिए।
 
ये वक़्त कैसा गुज़रा? इस सवाल पर मोगा (पंजाब) से आये एक बुज़ुर्ग किसान अमरजीत सिंह ने कहा, "मुश्किलें काफ़ी हैं, पर आपसी सहयोग बहुत है। आंदोलन की शुरुआत से मेरा बेटा यहाँ था। अब वो घर लौटा है, तो दस दिन पहले से मैं यहाँ हूँ।"
 
कैसा रहा गुज़रा 2020
प्रदर्शन में शामिल एक किसान ने कहा, "गुज़रा साल तो बहुत बुरा रहा हम लोगों के लिए। पहले तो कोरोना महामारी ने हमें मारा और उसके बाद सरकार द्वारा लाये गये इन काले क़ानूनों ने। पूरा साल बुरा गुज़रा।"

उन्होंने कहा, "उम्मीद तो बस यही है कि ये जो काले क़ानून हैं वो रद्द हो जायें और हमारी खेती-बाड़ी बच जाए।"
इस सवाल पर कि घर की याद नहीं आती? उन्होंने कहा, "फ़र्क़ नहीं पड़ता कि हम यहाँ रह रहे हैं। रात में सो जाते हैं, बल्कि यहाँ तो अच्छा ही है। गाँव में तो सिर्फ़ एक ही घर में सोते हैं। वही देखते हैं। यहाँ तो अलग-अलग रंग और दुनिया देखने को मिल रही है।"
 
अमृतसर से आये सुखविंदर सिंह भी किसान नहीं हैं, पर वो मानते हैं कि किसानों की माँगें जायज़ हैं। बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "मैं किसान नहीं हूँ, मेरे पास ज़मीन नहीं है, पर मेरे पास ज़मीर है।" उन्होंने कहा, "नये साल से बस इतनी उम्मीद है कि अपना घर छोड़कर जो लाखों लोग सड़कों पर बैठे हैं, उनकी माँगें पूरी हो जायें। क़ानून रद्द हों और वो ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर जाएं और नया साल मनाएं।"

'हम हिलने वाले नहीं'
वीरपल कौर 26 नवंबर से सिंघु बॉर्डर पर प्रदर्शन में शामिल हैं। वो कहती हैं, "26 नवंबर से शुरू हुआ प्रदर्शन हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा बदला है। जब हम यहाँ आये थे तो सबसे पहले हमारे ट्रॉलियों के घर बने। उसके बाद धीरे-धीरे हमारे मेहमान (प्रदर्शन को समर्थन देने वाले) बढ़ते गये और आज ये प्रदर्शन यहाँ तक आ पहुँचा है कि ये अपने आप में ही एक पिंड (गाँव) लगने लगा है।"

उन्होंने कहा, "लोग कहते हैं कि सरकार और पीएम मोदी के मंत्रियों के साथ बैठक का कुछ नतीजा नहीं निकल रहा, लेकिन ऐसा नहीं है। हर बैठक के साथ लोगों की समझ बढ़ रही है। लोगों में एकजुटता बढ़ रही है। हौसला बढ़ रहा है।"
 
वो बताती हैं, "जब हम पंजाब से चले थे तो यह इरादा करके ही चले थे कि इस क़ानून को रद्द करवाने के बाद ही वापस होंगे। इसलिए हम ना-उम्मीद तो कभी नहीं होते।"
 
30 दिसंबर को किसान संगठनों की दो माँगें केंद्र सरकार ने मान ली थीं, लेकिन किसानों का कहना है कि जब तक कृषि क़ानूनों को रद्द नहीं किया जायेगा, वो हिलने वाले नहीं हैं।
 
बीबीसी पंजाबी सेवा के संवाददाता ख़ुशहाल लाली किसान आंदोलन को पहले दिन से कवर करते रहे हैं। वो कहते हैं, "इस प्रदर्शन ने तीन बातें साफ़ कर दी हैं। पहली ये कि इस आंदोलन ने पंजाब की समृद्ध संस्कृति को साबित किया है। दूसरा ये कि ये देश एक लोकतांत्रिक देश है और यहाँ के लोग अपने हक़ लोकतांत्रिक तरीक़े से हासिल करने में सक्षम हैं। तीसरी ये कि किसानों के मुद्दे पर अब राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बात हो रही है।"
 
कैसा हो?
पंजाब के मोगा से ही रमन सिंह भी इस आंदोलन में शामिल हुए हैं। वो सरकार के प्रति सीधी नाराज़गी ज़ाहिर करते हैं और कहते हैं, "अगर कोई एक चीज़ जो मैं चाहूं कि साल 2020 की कभी ना लौटे, तो वो यह सरकार है।"
उन्होंने कहा, "आने वाले साल में हम बस ये चाहते हैं कि ये देश एक ख़ुशहाल देश बने, जहाँ इंसान की लूट ना हो।" रमन प्रदर्शन-स्थल का उदाहरण देते हुए कहते हैं, "जैसा प्यार यहाँ है, बस वैसा ही प्यार देश में हो जाये।"

अंत में हमारी मुलाक़ात दिल्ली में रहने वाले मनप्रीत सिंह से हुई। पेशे से आईटी सेक्टर में काम करने वाले मनप्रीत हर साल किसी न किसी पार्टी में होते थे लेकिन वो नया साल मनाने के लिए ही सिंघु बॉर्डर पहुँचे थे।

उन्होंने कहा, "हर साल तो हम अपने दोस्तों के साथ नया साल मनाते ही हैं, लेकिन इस बार यहाँ आना, अपने भाइयों के साथ खड़ा होना मुझे ज़रूरी लगा।"
 
 

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