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जिसने मांसाहारी पौधों की 35 नस्लें खोजीं

Updated: शनिवार, 8 अक्टूबर 2016 (12:22 IST)
- लुसी जोंस (बीबीसी अर्थ)
 
क्या आपको पता है कि इस दुनिया में कुछ पौधे भी मांसाहारी होते हैं? चौंक गए न! मगर ये है सौ फ़ीसद सच्ची बात। क़ुदरत में कई ऐसे पौधे पाए जाते हैं जो मांसाहार से ज़िंदगी बसर करते हैं। हालांकि जीवों को खाकर बसर करने वाले इन पौधों की तादाद बहुत कम है और ये बड़ी तेज़ी से ख़त्म होते जा रहे हैं।
ऐसे मांसाहारी पौधों को बचाने की मुहिम में जुटे हैं ब्रिटेन के स्टीवर्ट मैक्फर्सन। वो इन मांसाहारी पौधों के इतने बड़े मुरीद हैं कि वो इसके लिए पहाड़ों की चढ़ाई कर चुके हैं। रेगिस्तानों को नाप चुके हैं और झीलों की गहराई में उतर चुके हैं। मैक्फर्सन की इन्हीं कोशिशों का नतीजा है कि ख़ात्मे के कगार पर पहुंच चुके कुछ मांसाहारी पौधों की नस्ल फिर से जी उठी है।
 
मैक्फर्सन को बचपन में ही कीड़े-मकोड़े खाने वाले इन पौधों से लगाव हो गया था। आठ बरस की उम्र में एक ब्रिटिश गार्डेन सेंटर में उन्होंने पहली बार ऐसा पौधा देखा था। इसके बाद उन्होंने ऐसे पौधे जमा करने शुरू कर। कुछ ही सालों में उन्होंने अपने परिवार के बाग़ में इन पौधों की अच्छी ख़ासी तादाद जमा कर ली थी।
 
इसके बाद तो उन्होंने पेड़-पौधों के बारे में जानने-समझने को ही अपना करियर बना लिया। मैक्फर्सन ने देखा कि इन पौधों पर तो खात्मे का ख़तरा मंडरा रहा है।
 
वैसे तो मांसाहारी पेड़-पौधों का ख़याल बहुत पुराना है। पुरानी कहानियों में ऐसे पेड़ों का ज़िक्र मिलता है। लेकिन ये महज़ कल्पनाएं थीं। यहां तक कि जब ब्रिटिश वैज्ञानिक ने सबूतों के साथ मांसाहारी पौधों के बारे में जानकारी सामने रखी। तो भी, लोगों ने उस पर यक़ीन करने से इनकार कर दिया। डार्विन ने अपनी क़िताब ''इन्सेक्टीवोरस प्लांट्स'' में इन पौधों के बारे में विस्तार से लिखा था।
डार्विन की क़िताब पढ़ने के बाद से ही मैक्फर्सन को भी ऐसे पौधों से लगाव हो गया था। वो कुदरती तौर पर उगने वाले ऐसे पौधों को देखना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कई देशों का सफ़र किया। अपने तजुर्बों के आधार पर मैक्फर्सन ने एक फील्ड गाइड भी लिखी है। जिसमें उन्होंने कई देशों में पाए जाने वाले अलग-अलग नस्ल के मांसाहारी पौधों का ज़िक्र किया है।
 
पिछले कुछ सालों में मैक्फर्सन ने तीन सौ पहाड़ों की चढ़ाई की है। मांसाहारी पौधों की 35 नई नस्लों को खोजा है। उन्होंने बरसों पहले ख़त्म माने जा चुके नेपेंथिस डायनियाना नाम के मांसाहारी पौधे को फिलीपींस में खोज निकाला है।
 
भले ही मांस खाने वाले पौधों का ज़िक्र दिलचस्प लगता हो, मगर वैज्ञानिकों ने अक्सर इनकी तरफ़ से मुंह ही फेरे रखा है। मैक्फर्सन कहते हैं कि इन पौधों को जितनी अहमियत दी जानी चाहिए थी, उतनी दी नहीं गई।
 
हालांकि अब मैक्फर्सन और उनके जैसे कुछ और उत्साही वैज्ञानिकों की कोशिशों से इनके बारे में दुनिया के तमाम हिस्सों में काम हो रहा है। नतीजा ये कि पिछले दस सालों मे जितने मांसाहारी पौधे तलाशे गए, उतने इससे पहले के पूरे दौर में नहीं खोजे गए थे। इन पौधों की ज़्यादातर प्रजातियां जंगली इलाक़ों में पायी जाती हैं। मैक्फर्सन ने इन्हें तलाशने के लिए, मलेशिया, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया के जंगलों की ख़ाक छानी है।
 
एक बार तो इंडोनेशिया के कालीमंतन में नेपेंथिस पाइलोसा नाम के पौधे को तलाशने के लिए मैक्फर्सन का खाना ही ख़त्म हो गया। ज़िंदा रहने के लिए उनकी टीम को मेंढक खाकर बसर करना पड़ा था। लेकिन उनकी कोशिशों से ये पौधा जो साल 1899 के बाद से नहीं देखा गया था, खोज निकाला गया।
एक बार पिचर प्लांट के नाम से मशहूर एक मांसाहारी पौधे को तलाशने के लिए मैक्फर्सन, फिलीपींस के पलावन द्वीप पर गए। उस वक़्त वहां कोई भी जाना नहीं चाहता था। लेकिन वहां की पहाड़ियों में मैक्फर्सन को कई मांसाहारी पौधों की नस्लें मिलीं। मैक्फर्सन ने पिचर प्लांट की सात नई नस्लें खोजीं।
 
वैसे हमें अब भी नहीं मालूम कि ये पौधे अपने खाने के लिए कीड़े-मकोड़ों का शिकार कैसे करते हैं? हालांकि इनमें से ज़्यादातर या तो किसी घड़े या फिर टॉयलेट सीट जैसे आकार के होते हैं। साल 2015 में एक तजुर्बे में पाया गया था कि इंडोनेशिया के बोर्नियो में एक पौधा है जो चमगादड़ों को अपनी तरफ़ खींचता है। उसमें अल्ट्रासाउंड रिफ्लेक्टर होते है जिससे चमगादड़ों को उनकी तरफ़ आने का रास्ता मिलता है।
 
वैज्ञानिक कहते हैं कि मांसाहारी पौधे अक्सर वहां उगते हैं जहां मिट्टी में पोषक तत्व कम पाए जाते हैं। इनकी कमी को वो कीड़े-मकोड़ों और छोटे जानवरों का शिकार करके पूरा करते हैं।
 
इसके लिए क़ुदरत ने इन पौधों को कई हथियार दिए हैं, जैसे ड्रोसेरा नाम के एक पौधे की सतह पर गोंद जैसा रिसाव होता है। कीड़े आकर उसमें बैठते हैं तो फंस जाते हैं। इसी तरह नेपेंथिस नस्ल के पौधों का अलग-अलग आकार होता है जिसमें कीड़े-मकोड़े फंस जाते हैं। कई बार चूहे और चमगादड़ जैसे जीव भी इन पौधों की चपेट में आ जाते हैं।
 
ऐसे कुछ मांसाहारी पौधे पानी के भीतर भी होते हैं जैसे सार्सीनिया सिटासिना। ये पानी के अंदर मेंढक के बच्चों को अपनी चपेट में ले लेता है। इसके लिए इस पौधे में केकड़े जैसे रेशे वाली चीज़ें होती हैं।
 
इन पौधों की ख़ूबियों की वजह से ही शिकारियों की इन पर नज़र होती है। इसी वजह से दुनिया में मांसाहारी पौधों की तादाद बेहद कम होती जा रही है। वैसे मैक्फर्सन जैसे लोगों की कोशिशों से ऐसे कई जंगली पौधों को अलग अलग जगह उगाया जा रहा है।
धरती के बदलते तापमान, जंगलों की कटाई वग़ैरह से इन पौधों की नस्लों पर ख़तरा मंडरा रहा है। ऐसा ही एक पौधा है नेपेंथिस रिजिडिफोलिया। इस प्रजाति का दुनिया में सिर्फ़ एक पौधा बचा है। असल में इन पौधों के नर और मादा अलग-अलग होते हैं। ऐसे में इन्हें बचाने की मुहिम में भी बड़ी मुश्किल आती है।
 
कुछ जगह ये पौधे जब अपने शिकार के लिए कीड़े नहीं पाते, तो मिट्टी से पोषक तत्व खींचने की कोशिश करते हैं। शायद खाने की कमी से ये मांसाहारी पौधे अब शाकाहारी होते जा रहे हैं। स्वीडन में एक मांसाहारी नस्ल के पौधे के शाकाहारी होने की बात देखी गई है।
 
सवाल ये है कि ऐसे मांसाहारी पौधों का भविष्य क्या है? शायद इस तरह अपने खान-पान में बदलाव करके इन पौधों की कुछ प्रजातियां ख़ुद को बचा ले जाएं। पर जो बहुत कम तादाद में बचे हैं, उनका शिकार होने और ख़ात्मे का डर ज़्यादा है। मैक्फर्सन कहते हैं कि मांसाहारी पौधों को बचाने की ये लड़ाई ऐसी है जिसे हम तेज़ी से हार रहे हैं।
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