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Pradosh Vrat 2025: शुक्र प्रदोष व्रत आज, जानें मुहूर्त, महत्व, पूजा विधि और कथा

WD Feature Desk
शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025 (10:40 IST)
Shukra Pradosh Vrat Puja : आज, 25 अप्रैल 2025 को वैशाख कृष्ण त्रयोदशी है और इसलिए शुक्र प्रदोष व्रत है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है और इसे करने से सुख-समृद्धि, सौभाग्य और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। इस दिन प्रदोष काल सूर्यास्त के बाद का समय होता है और इस समय भगवान शिव की पूजा करना विशेष फलदायी माना जाता है।ALSO READ: पहलगाम का वह मंदिर जहां माता पार्वती ने श्री गणेश को बनाया था द्वारपाल, जानिए कौन सा है ये मंदिर
 
शुक्र प्रदोष व्रत 2025 पर पूजन के शुभ मुहूर्त :
 
वैशाख कृष्ण त्रयोदशी का प्रारम्भ- 25 अप्रैल को सुबह 11 बजकर 44 मिनट सेल 
त्रयोदशी तिथि समाप्त-26 अप्रैल को सुबह 08 बजकर 27 मिनट पर।
- प्रदोष काल पूजा मुहूर्त: शाम 06 बजकर 53 बजे से रात 09 बजकर 03 मिनट तक।
- त्रयोदशी पूजन की कुल अवधि : 02 घंटे 10 मिनट्स
 
महत्व: धार्मिक मान्यतानुसार शुक्र प्रदोष व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत संतान पक्ष के लिए भी लाभकारी माना जाता है। यह व्रत करने से जीवन में सुख, सौंदर्य, धन और वैवाहिक सुख की प्राप्ति होती है। जिनकी कुंडली में शुक्र ग्रह अशुभ हो, उन्हें यह व्रत अवश्य करना चाहिए। इस व्रत को करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है और जीवन के सभी संकट दूर होते हैं।
 
पूजा विधि:
1. प्रातः काल उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
2. भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
3. प्रदोष काल में यानी शाम को पुन: स्नान करें।
4. पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र करें।
5. भगवान शिव और माता पार्वती की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
6. उन्हें चंदन, रोली, मौली, अक्षत, पुष्प, बेलपत्र, धतूरा, भांग आदि अर्पित करें। 
7. घी का दीपक जलाएं।
8. भगवान शिव को सफेद मिठाई या फल का भोग लगाएं।
9. 'ॐ नमः शिवाय' या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।
10. शुक्र प्रदोष व्रत की कथा सुनें या पढ़ें।
11. शिव चालीसा का पाठ करें।
12. अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें।
13. पूजा में हुई गलतियों के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
इस दिन माता पार्वती को श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करना विशेष तौर पर शुभ माना जाता है।
 
व्रत कथा: शुक्र प्रदोष व्रत की कई कथाएं प्रचलित हैं। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक नगर में तीन मित्र थे- राजकुमार, ब्राह्मण कुमार और सेठ पुत्र। राजकुमार और ब्राह्मण कुमार विवाहित थे, लेकिन सेठ पुत्र का विवाह के बाद गौना नहीं हुआ था। एक दिन तीनों मित्रों ने स्त्रियों की चर्चा की, जिस पर ब्राह्मण कुमार ने कहा कि नारीहीन घर भूतों का डेरा होता है। 
 
सेठ पुत्र ने यह सुनकर तुरंत अपनी पत्नी को लाने का निश्चय किया, जबकि उसके माता-पिता ने शुक्र अस्त होने के कारण उसे रोका था। अपनी जिद पर अड़े सेठ पुत्र ने ससुराल जाकर अपनी पत्नी को विदा कराया। रास्ते में उनकी बैलगाड़ी का पहिया टूट गया, बैल की टांग टूट गई और पत्नी को भी चोट आई। आगे बढ़ने पर डाकुओं ने उन्हें लूट लिया। घर पहुंचने पर सेठ पुत्र को सांप ने डस लिया और वैद्य ने उसके तीन दिन में मरने की भविष्यवाणी की।
 
ब्राह्मण पुत्र को जब यह पता चला तो उसने सेठ से अपने पुत्र को पत्नी सहित वापस ससुराल भेजने को कहा। सेठ ने वैसा ही किया। उधर, ब्राह्मणी प्रदोष व्रत करती थी। एक दिन उसे रास्ते में एक घायल राजकुमार मिला, जिसे वह अपने घर ले आई। गंधर्व कन्या अंशुमति ने राजकुमार को देखा और उससे विवाह कर लिया। 
 
ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के प्रभाव और गंधर्वराज की सहायता से राजकुमार ने अपने शत्रुओं को पराजित कर अपना राज्य वापस पा लिया और ब्राह्मण पुत्र को मंत्री बनाया। इस प्रकार, प्रदोष व्रत के प्रभाव से सभी के कष्ट दूर हुए। मान्यतानुसार यह व्रत श्रद्धापूर्वक करने से भगवान शिव सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
 
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