शनि त्रयोदशी : जानिए कौन से 10 काम करें खास

Shani Dev
अनिरुद्ध जोशी| पुनः संशोधित शनिवार, 18 सितम्बर 2021 (11:40 IST)
प्रत्येक माह में जिस तरह दो एकदशी होती है उसी तरह दो प्रदोष भी होते हैं। त्रयोदशी (तेरस) को प्रदोष कहते हैं। जब यह त्रयोदशी शनिवार के दिन आती है तो उसे शनि त्रयोदशी कहते हैं। आओ जानते हैं इस दिन कौनसे 10 खास कार्य करना चाहिए।

1. पुत्र रत्न की प्राप्ति : पुत्र का विधिवत व्रत रखने से पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।

2. मनोकामना होगी पूर्ण : शनि प्रदोष का व्रत रखते से हर तरह की मनोकामना भी पूर्ण होती है।

3. नौकरी में पदोन्नति : शनि प्रदोष का व्रत विधिवत रखने से नौकरी में पदोन्नति की प्राप्ति के योग भी बनते हैं।

5. शिवजी का मिलता आशीर्वाद : प्रददोष का व्रत करने से शिवजी का आशीर्वाद प्राप्त होता है और सभी तरह की मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है।

6. अभीष्ट फल की प्राप्ति : शनि प्रदोष के व्रत को पूर्ण करने से अतिशीघ्र कार्यसिद्धि होकर अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। सर्वकार्य सिद्धि हेतु शास्त्रों में कहा गया है कि यदि कोई भी 11 अथवा एक वर्ष के समस्त त्रयोदशी के व्रत करता है तो उसकी समस्त मनोकामनाएं अवश्य और शीघ्रता से पूर्ण होती है।

7. चंद्र दोष होता है दूर : प्रदोष रखने से आपका चंद्र ठीक होता है। अर्थात शरीर में चंद्र तत्व में सुधार होता है। माना जाता है कि चंद्र के सुधार होने से शुक्र भी सुधरता है और शुक्र से सुधरने से बुध भी सुधर जाता है। प्रदोष का व्रत करने से कुंडली में स्थित चंद्र दोष समाप्त हो जाता है।

6. प्रदोष व्रत के नियम : प्रदोष काल में उपवास में सिर्फ हरे मूंग का सेवन करना चाहिए, क्योंकि हरा मूंग पृथ्‍वी तत्व है और मंदाग्नि को शांत रखता है। प्रदोष व्रत में लाल मिर्च, अन्न, चावल और सादा नमक नहीं खाना चाहिए। हालांकि आप पूर्ण उपवास या फलाहार भी कर सकते हैं।


व्रत वाले दिन सूर्योदय से पहले उठें। नित्यकर्म से निपटने के बाद सफेद रंग के कपड़े पहने। पूजाघर को साफ और शुद्ध करें। गाय के गोबर से लीप कर मंडप तैयार करें। इस मंडप के नीचे 5 अलग अलग रंगों का प्रयोग कर के रंगोली बनाएं। फिर उतर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे और शिव जी की पूजा करें। पूरे दिन किसी भी प्रकार का अन्य ग्रहण ना करें।

7. प्रदोष व्रत कथा : प्रदोष को प्रदोष कहने के पीछे एक कथा जुड़ी हुई है। संक्षेप में यह कि चंद्र को क्षय रोग था, जिसके चलते उन्हें मृत्युतुल्य कष्टों हो रहा था। भगवान शिव ने उस दोष का निवारण कर उन्हें त्रयोदशी के दिन पुन:जीवन प्रदान किया था अत: इसीलिए इस दिन को प्रदोष कहा जाने लगा।

पद्म पुराण की एक कथा के अनुसार चंद्रदेव जबअपनी 27 पत्नियों में से सिर्फ एक रोहिणी से ही सबसे ज्यादा प्यार करते थे और बाकी 26 को उपेक्षित रखते थे जिसके चलते उन्हें श्राप दे दिया था जिसके चलते उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। ऐसे में अन्य देवताओं की सलाह पर उन्होंने शिवजी की आराधना की और जहां आराधना की वहीं पर एक शिवलिंग स्थापित किया। शिवजी ने प्रसन्न होकर उन्हें न केवल दर्शन दिए बल्कि उनका कुष्ठ रोग भी ठीक कर दिया। चन्द्रदेव का एक नाम सोम भी है। उन्होंने भगवान शिव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहां तपस्या की थी इसीलिए इस स्थान का नाम 'सोमनाथ' हो गया।

8. मानसिक बैचेनी खत्म और दूर होती है दरिद्रता : हर माह के दोनों प्रदोष के व्रत को रखने से मन की बैचेनी और भय का समाधान हो जाता है। इससे दरिद्रता भी दूर हो जाती है।

9. शनिदेव का मिलता आशीर्वाद : शनि प्रदोष का व्रत रखने से शनिदेव का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस व्रत को रखने से शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या का प्रभाव कम होता है।

10. लंबी आयु होती प्राप्त : इस व्रत को करने से जातक को लंबी आयु प्राप्त होती है। मान्यता है कि ये व्रत रखने वाले जातकों के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं और मृत्यु के बाद उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।




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