पाणिग्रहण हेतु शुद्ध लग्न एवं दिन का होना बहुत ही आवश्यक है क्योंकि शुद्ध लग्न व तिथि में किया गया विवाह अनेक दाम्पत्य-सुख संबंधी दोषों का शमन करने में सहायक होता है। वर्तमान काल में विवाह मुहूर्त एवं शुद्ध लग्न साधन की घोर उपेक्षा की जा रही है जिसके अत्यंत गम्भीर दुष्परिणाम हमें दाम्पत्य सुख में कमी, दम्पत्तियों के मध्य वैचारिक मतभेद, संतानहीनता, असमय वैधव्य और विवाह-विच्छेद के रूप में देखने को मिलते हैं।
विवाह मुहूर्त का निर्धारण करते समय अनेक बातों का ध्यान रखा जाना आवश्यक है इसलिए विवाह मुहूर्त का निर्धारण सदैव किसी विद्वान दैवज्ञ से ही करवाना चाहिए। विवाह मुहूर्त का निर्धारण करते समय मास, पक्ष, तिथि, योग, करण एवं नक्षत्र का ध्यान रखा जाना अनिवार्य है। विवाह मुहूर्त के चयन में जन्ममास, जन्मतिथि एवं जन्मनक्षत्र को सर्वर्था त्यागना चाहिए।
शास्त्रानुसार पुष्य नक्षत्र को विवाह में वर्जित माना गया है, मतांतर से कुछ विद्वान पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र को भी विवाह के लिए श्रेष्ठ नहीं मानते, इसके अतिरिक्त दस दोषों को अति-महत्वपूर्ण माना गया है, जिन्हें त्यागना अनिवार्य है। यदि किसी विवाह मुहूर्त इन दस दोषों में से एकाधिक दोष उपस्थित हो तो उस मुहूर्त को त्याग देना ही श्रेयस्कर होता है।
(1) लत्ता दोष (2) पात दोष (3) युति दोष (4) वेध दोष (5) जामित्र दोष (6) बाण दोष (7) एकार्गल दोष (8) उपग्रह दोष (9) क्रांतिसाम्य दोष (10) दग्धातिथि दोष।
उपर्युक्त दस दोषों में भी वेध दोष, बाण दोष (मृत्युबाण), क्रांतिसाम्य और दग्धातिथि दोष को सर्वत्र त्यागना ही चाहिए।
शुद्ध लग्न का चयन
विवाह का दिन निश्चित हो जाने पर अगला चरण पाणिग्रहण हेतु शुद्ध लग्न के चयन का होता है। शुद्ध लग्न के चयन में दैवज्ञ को अति-सावधानीपूर्वक शुद्ध लग्न का चयन करना चाहिए। शुद्ध लग्न के चयन में निम्न बातों का ध्यान रखा जाना आवश्यक है।
(1) वर-वधू की जन्मराशि एवं जन्मलग्न से अष्टम राशि का लग्न विवाह हेतु चयन नहीं किया जाना चाहिए।
(2) वर-वधू की जन्मराशि एवं जन्मलग्न से अष्टमेश यदि विवाह लग्न में स्थित हो तो उस लग्न को त्याग देना चाहिए।
(3) विवाह लग्न में यदि क्रूर ग्रह स्थित हों तो उस लग्न को त्याग देना चाहिए।
(4) विवाह लग्न के तृतीय भाव में शुक्र, चतुर्थ में राहु, षष्ठ में विवाह लग्न का अधिपति (लग्नेश)-चन्द्र-शुक्र स्थित हों तो उसे ग्रहण नहीं करना चाहिए।
(5) विवाह लग्न के सप्तम भाव यदि कोई भी ग्रह स्थित हो तो उसे भी त्याग देना चाहिए।
(6) विवाह लग्न के अष्टम भाव में विवाह लग्न का लग्नेश, चन्द्र केतु एवं दशम भाव में मंगल और द्वादश भाव में शनि व चन्द्र स्थित हों तो उस लग्न को विवाह हेतु ग्रहण नहीं किया जाना चाहिए।
'गोधूलि-लग्न' की ग्राह्यता
यदि विवाह का दिन निश्चित हो जाने पर उपर्युक्त शास्त्रोक्त सिद्धांत के अनुसार शुद्ध लग्न नहीं मिल रही हो तो उस दिन 'गोधूलि-लग्न' को ग्रहण किया जाना चाहिए। 'गोधूलि-लग्न' की अवधि सूर्यास्त होने से 12 मिनट पूर्व और 12 मिनट पश्चात् तक की मानी गई है, मतांतर से कुछ विद्वान इसे सूर्यास्त से 24 मिनट पूर्व और 24 मिनट पश्चात की मानते हैं किंचित् समय की अधिक उपलब्धता उनकी इस मान्यता का आधार हो सकती है।
'गोधूलि-लग्न' आपातकालीन व्यवस्था, शुद्ध लग्न ही सर्वोपरि
शास्त्र का स्पष्ट निर्देश है कि 'गोधूलि-लग्न' की ग्राह्यता केवल आपातकालीन व्यवस्था के अंतर्गत ही है, जब शुद्ध लग्न मिल रही हो तो पाणिग्रहण हेतु शुद्ध लग्न को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। लग्न अवधि के अंतर्गत पाणिग्रहण (हथलेवा) एवं कन्यादान का संकल्प किया जाना चाहिए।
-ज्योतिर्विद् पं. हेमन्त रिछारिया
प्रारब्ध ज्योतिष परामर्श केन्द्र