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Written By WD Feature Desk
Last Updated : बुधवार, 18 फ़रवरी 2026 (15:45 IST)

होलाष्टक की पौराणिक कथा: क्यों माने जाते हैं ये 8 दिन अशुभ?

holashtak ki kahani
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार होलाष्टक की कथा भक्त प्रह्लाद और उसके पिता हिरण्यकश्यप से जुड़ी है। इसी के साथ यह इसकी कथा कामदेव को शिवजी द्वारा भस्म किए जाने की कथा से भी जुड़ी है। चलिए जानते हैं दोनों ही कथाएं संक्षिप्त में। 
 

होलाष्टक की पौराणिक कथा: भक्त प्रहलाद और हिरण्याकश्यप

हिरण्यकश्यप एक अत्याचारी और अहंकारी राजा था। उसने ब्रह्मा से वरदान पाया था कि वह न दिन में मरेगा, न रात में, न घर के भीतर, न बाहर, न किसी अस्त्र से और न किसी मनुष्य या पशु द्वारा। इस वरदान के घमंड में वह स्वयं को भगवान मानने लगा और प्रजा को आदेश दिया कि केवल उसी की पूजा की जाए। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। वह हर समय नारायण का नाम जपता और विष्णु भक्ति करता था। यह बात हिरण्यकश्यप को बिल्कुल पसंद नहीं थी। उसने प्रह्लाद को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन जब वह नहीं माना तो उसे मारने के अनेक प्रयास किए।
 

भक्त प्रहलाद को दी प्रताड़ना

हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को ऊँचे पर्वत से गिरवाया, विष पिलाया, हाथियों से कुचलवाया, समुद्र में फेंकवाया लेकिन हर बार भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गया। अंत में उन्हें आग में जलाने की साजिश रची। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगी। राजा ने आदेश दिया कि होलिका अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठे ताकि प्रह्लाद जल जाए। लेकिन हुआ उल्टा, भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहा और होलिका जलकर भस्म हो गई। यही घटना आगे चलकर होलिका दहन के रूप में मनाई जाने लगी।
 

भगवान श्री नृसिंह द्वारा हरिण्याकश्यप का वध 

जब हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद से पूछा कि उसका भगवान कहाँ है, तो प्रह्लाद ने कहा कि "वह हर जगह है, इस स्तंभ में भी।" राजा ने क्रोध में स्तंभ पर प्रहार किया और उसी समय भगवान विष्णु ने नरसिंह रूप में प्रकट होकर।
 
  • संध्या समय (न दिन, न रात)
  • द्वार की चौखट पर (न अंदर, न बाहर)
  • अपनी जांघों पर
  • नाखूनों से
  • हिरण्यकश्यप का वध कर दिया। इस प्रकार वरदान की शर्तें भी टूटीं नहीं और अधर्म का अंत हुआ।
holashtak ki kahani, ध्यान करते शिवजी के पास प्रार्थना करती रति

होलाष्टक की पौराणिक कथा: कामदेव भस्म और प्रेम की अग्निपरीक्षा

राजा हिमालय की पुत्री पार्वती भगवान शिव से विवाह करना चाहती थीं, पर शिवजी अपनी गहन तपस्या में लीन थे। पार्वती की सहायता के लिए कामदेव आगे आए और उन्होंने शिवजी पर प्रेम बाण चलाया, जिससे उनकी तपस्या भंग हो गई। क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपनी तीसरी आँख खोल दी, जिसकी ज्वाला से कामदेव तुरंत भस्म हो गए। यह घटना फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को हुई, और तभी से होलाष्टक की परंपरा शुरू मानी जाती है।
 
कामदेव की पत्नी रति ने शिवजी से अपने पति को पुनर्जीवित करने के लिए 8 दिनों तक प्रार्थना की। रति की भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने कामदेव को दूसरे जन्म में रति से मिलने का वचन दिया। कालांतर में कामदेव ने भगवान कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म लिया।
 
इस घटना के बाद, शिवजी ने पार्वती की आराधना स्वीकार की और उन्हें अपनी पत्नी के रूप में अपनाया। इसी कारण, होली की अग्नि में वासनात्मक आकर्षण (मोह) को प्रतीकात्मक रूप से जलाकर, सच्चे प्रेम और त्याग की विजय का उत्सव मनाया जाता है, जो होलाष्टक के दौरान कामदेव के भस्म होने की कथा से जुड़ा है।