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इस वर्ष 24 मार्च को बड़ी गणेश चतुर्थी है, जानिए कैसे करें पूजन और व्रत

Updated: शुक्रवार, 22 मार्च 2019 (16:25 IST)
श्री गणेश जी को सभी तिथियों में चतुर्थी की तिथि सर्वाधिक प्रिय है। गणेश संकष्ट व्रत हर माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन आता है। चतुर्थी की तिथि माह में दो बार आती है, एक शुक्ल पक्ष में दूसरा कृष्ण पक्ष में। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायकी चतुर्थी कहते हैं और कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी के नाम से जाना जाता है।  
 
संकष्टी चतुर्थी का आशय है संकट को हरने वाली चतुर्थी। गणेश जी की प्रथम आऱाध्य देवता के रूप में पूजा की जाती है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करने से पहले भगवान गणपति जी का आराधना की जाती है। किसी भी देवता या देवी का पूजन जब तक निर्रथक है जब तक गणेश जी की पूजा न कर ली जाए। इस बात की व्याख्या शिवपुराण, स्कंद पुराण, अग्नि पुराण एवं ब्रह्मवैवर्त पुराण आदि में स्पष्ट रूप से मिलती है। 
 
'विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते।।
 
कैसे करें पूजन?
 
इस दिन महिलाएं विशेषकर माएं पूरे दिन निर्जल व्रत रखती हैं। सुबह स्‍नान के पश्‍चात साफ कपड़े पहन कर एक चौकी पर लाल या पीले रंग का कपड़ा बिछाकर उस पर पूरे विधि-विधान के साथ भगवान श्रीगणेश जी की प्रतिमा को ईशान कोण में स्‍थापित किया जाता है। गणेशजी की पूजा के लिए जल, अक्षत, दूर्वा, लड्डू, पान, सुपारी और धूप आदि का विशेष तौर पर उपयोग होता है। 
 
पूजा की शुरुआत ॐ गणेशाय नम:' मंत्र के जप से करनी चाहिए। संकष्टी व्रत करने वाले भक्तों पर विध्न-विनाशक गणेश जी की विशेष अनुकंपा रहती है और उनके सुख-सौभाग्य में वृद्धि होती है। श्री गणेश संकष्टी चतुर्थी का उपवास जो पूर्ण श्रद्धा व विश्वास के साथ करता है, उसे बुद्धि और ऋद्धि-सिद्धि तीनों की प्राप्ति होती हैं और जीवन में आनेवाली तमाम विध्न बाधाओं का भी नाश होता है। व्रत एवं गणेश जी के पूजन के पश्चात ब्राह्मण को भोजन करवाने से अर्थ-धर्म-काम-मोक्ष सभी अभिलाषित पदार्थ प्राप्त किए जा सकते हैं। यह बात गणेश पुराण में भी उल्लेखित है। 
 
नारद पुराण में संकष्टी व्रत की कथा और पूजन विधि विस्तार से वर्णित है। पांडव जब वनवास झेल रहे थे, तब उन्होंने महर्षि वेद व्यास जी से अपने संकटों के निवारण का आध्यात्मिक समाधान पूछा, तब महर्षि ने पांडवों को इस व्रत का विधान बतलाया। द्रौपदी ने भी यह व्रत रखा था और इसी के प्रताप से पांडवों को समस्त बाधाओं से मुक्ति मिली। 

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