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अधिक मास में शुद्धता और पवित्रता के साथ करें श्रीहरि विष्णु का पूजन

* पुरुषोत्तम मास में क्यों खास हैं विष्णु पूजन, जानिए... 
 
पौराणिक शास्त्रों के अनुसार हर तीसरे साल पुरुषोत्तम यानी अधिक मास की उत्पत्ति होती है। इस माह उपासना करने का अपना अलग ही महत्व है। इस माह के दौरान जप, तप, दान से अनंत पुण्यों की प्राप्ति होती है। 
 
इस माह में श्रीकृष्‍ण, श्रीमद्‍भगवतगीता, रामकथा वाचन और श्रीहरि विष्‍णु भगवान की उपासना की जा‍ती है। इस माह के संबंध में माना जाता है कि मास के कम-अधिक होने की व्यवस्था चंद्र मास में ही होती है, लेकिन यह निर्णय सूर्य संक्रांति से होता है। सामान्यतः प्रत्येक माह में संक्रांति अर्थात सूर्य का राशि परिवर्तन एक बार अवश्य रहने से चंद्र मास की प्रक्रिया सहज चलती रहती है। जब मास में 2 सौर संक्रांतियों का समावेश हो जाए तो क्षय मास आता है एवं जिस माह में सूर्य संक्रांति का अभाव हो, उसे 'अधिक मास' कहते हैं।
 
पंचांग गणना के अनुसार एक सौर वर्ष में 365 दिन, 15 घटी, 31 पल व 30 विपल होते हैं जबकि चन्द्र वर्ष में 354 दिन, 22 घटी, 1 पल व 23 विपल होते हैं। सूर्य व चन्द्र दोनों वर्षों में 10 दिन, 53 घटी, 30 पल एवं 7 विपल का अंतर प्रत्येक वर्ष में रहता है। सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के मध्य होने वाले फर्क को अधिक मास द्वारा पाटा जाता है। 
 
अधिक मास भगवान विष्णु को प्रिय होने के कारण उन्होंने इसे अपना नाम 'पुरुषोत्तम' दिया। इस कारण से इसे 'पुरुषोत्तम मास' भी कहते हैं। अधिक मास की कथा, माहात्म्य का भी पाठ करने से पुण्यों का संचय होता है। इस माह में व्रत, दान, जप करने का अव्यय फल प्राप्त होता है। व्यक्ति यदि गेहूं, चावल, मूंग, जौ, मटर, तिल, ककड़ी, केला, आम, घी, सौंठ, इमली, सेंधा नमक, आंवले का भोजन करें तो उसे जीवन में कम शारीरिक कष्ट होता है। उक्त पदार्थ या उससे बने पदार्थ उसके जीवन में सात्विकता की वृद्धि करते हैं। 


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उड़द, लहसुन, प्याज, राई, मूली, गाजर, मसूर की दाल, बैंगन, फूलगोभी, पत्तागोभी, शहद, मांस, मदिरा, धूम्रपान, मादक द्रव्य आदि का सेवन करने से तमोगुण की वृद्धि का असर जीवनपर्यंत रहता है। 
 
इस माह में जितना हो सके उतना संयम अर्थात ब्रह्मचर्य का पालन, फलों का भक्षण, शुद्धता, पवित्रता, ईश्वर आराधना, एकासना, देवदर्शन, तीर्थयात्रा आदि अवश्य करना चाहिए। सभी नियम अपने सामर्थ्य अनुसार करना चाहिए। यदि पूरे मास यह नहीं हो सके तो एक पक्ष में अवश्य करना चाहिए।
 
यदि उसमें भी असमर्थ हों तो चतुर्थी, अष्टमी, एकादशी, प्रदोष, पूर्णिमा, अमावस्या को अवश्य देव कर्म करें। इन तिथियों पर भी न कर पाएं तो एकादशी, पूर्णिमा को परिवार सहित कोई भी शुभ काम अवश्य करें।

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