तुम जानो तुमको ग़ैर से जो रस्मो-राह हो

तुम जानो तुमको ग़ैर से जो रस्मो-राह हो मुझको भी पूछते रहो तो क्या गुनाह हो?- ग़ालिब
इशारा गहरे संबधों की तरफ है और शब्द रस्मो-राह जैसा नर्म - मुलायम और हलका है ताकि बुरा न महसूस हो। यही ग़ालिब की खूबी है औऱ यही इस शेर की भी। फिर पूरी बात से ग़ालिब की शोखी झलक रही है। प्रतिस्पर्धी प्रेमी का ज़िक्र इतने शोख लहजे में केवल ग़ालिब ही कर सकते हैं। इसीलिए वो महान हैं।



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