शतरंज का शहंशाह : विश्वनाथन आनंद

- सीमान्‍त सुवीर

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मास्को में जब बुधवार की देर शाम पांचवीं बार विश्व शतरंज के शहंशाह बने तो भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने कुछ देर तक इसे पहली खबर बनाया और रात गहराते-गहराते यह खबर हाशिए पर चली गई, क्योंकि शतरंज की खबर के पीछे न तो पैसा था और न ही मार्केटिंग और न ही इससे टीवी वालों की टीआरपी बढ़ने वाली थी। इन तमाम बातों के बाद भी खेल को चाहने वालों ने दिल ही दिल आनंद की इस कामयाबी पर उन्हें कड़कता सैल्यूट किया।

शतरंज का जन्मदाता भारत ही है और यहां का एक खिलाड़ी दुनिया में अपनी बादशाहत कायम करता है और वह भी पांचवीं दफा तो 'आनंदमय' होना लाजमी है। मास्को में जब आनंद और इसराइली शातिर के बीच विश्व चैम्पियन बनने की जंग चल रही थी तो वहां जगह -जगह बड़ी-बड़ी स्‍क्रीन पर शतरंज के दीवाने उनकी बाजी को टकटकी लगाए देख रहे थे, लेकिन भारत में तब क्रिकेट के दीवाने आईपीएल-5 के आगोश में समाए हुए थे और शतरंज प्रेमी भी सिर्फ यहीं तक सीमित थे कि 12 बाजियों में कौनसी बाजी किसके पक्ष में गई।
बहरहाल, आनंद का विश्व चैम्पियन बनना पूरे देश के लिए फख्र की बात है। आनंद ने 6 साल की उम्र से शतरंज की बिसात पर अपने दिमागी घोड़े दौड़ाने शुरु कर दिए थे और मां सुशीला ने अपने बेटे को माहिर शतरंज खिलाड़ी बनने में मदद की। पिता विश्वनाथन आनंद जो दक्षिण रेलवे के मुलाजिम थे, उन्हें बेटे के शतरंज खिलाड़ी बनने पर कोई आपत्ति नहीं थी।
वक्त गुजरा और 14 साल की उम्र में जब आनंद ने 1983 में अंडर 14, अंडर 16 और अंडर 19 के राष्ट्रीय खिताब जीते तो पूरे देश की नजर इस बच्चे पर पड़ी और तभी से तय हो गया था कि वह आने वाले समय में एक बड़ा खिलाड़ी बनेगा।

महज चार साल बाद 1987 में जब आनंद ने ग्रैड स्लैम खिताब जीतने वाले पहले भारतीय बनने का गौरव हासिल किया तो उन्हें दुनिया के कोने-कोने से अपने यहां खेलने के निमंत्रण मिलने लगे। 1995 में वे पहली बार विश्व चैम्पियन के खिताब के लिए गैरी कास्परोव से टक्कर लेने पहुंचे, लेकिन मुकाबला हार गए। हार में भी आनंद को बहुत कुछ सीखने का मौका मिला।
2000 में आनंद के जीवन में खूबसूरत लम्हा तब आया, जब वे एलेक्स शिरोव को मात देकर फीडे विश्व चैम्पियन बने। 2002 में ‍विश्व चैम्पियन की गद्दी संभाल नहीं सके और दूसरे नंबर पर खिसक गए। 2007 में वे दोबारा विश्व विजेता बनकर दुनिया के पहले नंबर की कुर्सी पर बैठने में सफल रहे। 2008 और 2010 की विश्व शतरंज चैम्पियनशिप में आनंद की बादशाहत कायम रही। ...और 2012 में आनंद ने विश्व चैम्पियनशिप को जीतकर शतरंज के शहंशाह बनने में कोई कसर बाकी नहीं रखी।
आनंद का दिमाग कितना तेज है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है, जब उन्होंने 2003 में कम्प्यूटर को भी मात दे दी। वर्ल्ड रेपिड शतरंज में 25 मिनट की बाजी होती है और हर चाल चलने के लिए मात्र 10 सेकंड का वक्त। यहां पर आनंद की बादशाहत कायम रही और वे चैम्पियन बने।

विश्वनाथन आनंद का निक नेम 'विशी' है और पैट नेम बाबा व सागरा। चेन्नई में रहते हैं और पिता विश्वनाथन अय्यर दक्षिण रेलवे से जनरल मैनेजर के पद से सेवानिवृत हुए। आनंद से 11 साल छोटा भाई शिवकुमार और 13 साल छोटी बहन अनुराधा है।
आनंद का विवाह जून 1996 में अरुणा से हुआ और अरुणा का 'लेडी लक' का ही नतीजा रहा कि वे 2000 में पहली बार विश्व विजेता बने। 11 दिसंबर 1969 में चेन्नई में जन्मे आनंद को तमिल, अंग्रेजी, हिन्दी, जर्मन, स्पेनिश और फ्रेंच भाषा का अच्छा खासा ज्ञान है और वे यह तमाम भाषाएं धाराप्रवाह बोलते हैं।

आनंद को पढ़ना, स्वीमिंग, संगीत सुनना पसंद है। आनंद के बेटे का नाम अखिल है, जिसका जन्म 9 अप्रैल 2011 को हुआ है। वे साल के 12 महीनों में 8 महीने शतरंज खेलने में व्यस्त रहते हैं।
आनंद को मिले अवॉर्ड : आनंद को 1985 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1987 में पद्मश्री, 1991-92 में राजीव गांधी खेल रत्न अवॉर्ड और 2007 में पद्मविभूषण से नवाजा गया। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जब भारत दौरे पर आए थे, तब प्रधानमंत्री ने चुनिंदा लोगों को भोज पर आमंत्रित किया था और इसमें विश्वनाथन आनंद को भी न्योता दिया गया था। इस मान से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश्‍ा में आनंद का कद कितना ऊंचा है।
देश में क्रिकेट को धर्म की तरह मानने वाले खेलप्रेमी क्‍या कभी शतरंज की दुनिया के शहंशाह आनंद को वह सम्‍मान देंगे, जिसके वे सही हकदार हैं? यकीन मानिए कि आनंद की यह कामयाबी सचिन तेंडुलकर के 100 अंतरराष्ट्रीय शतक के समान है, काश! देशवासियों के साथ-साथ मीडिया भी आनंद को सचिन की कामयाबी जैसा सम्मान देता...

 

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