सिंहासन बत्तीसी : सत्‍ताइसवीं पुतली मलयवती की कहानी

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शंख लेकर वे समुद्र के पास आए और पूरी शक्ति से शंख फूंकने लगे। समुद्र देव उपस्थित हुए और समुद्र का पानी दो भागों में विभक्त हो गया। समुद्र के बीचोंबीच अब भूमि मार्ग दिखाई देने लगा। उस मार्ग पर राजा आगे बढ़ते रहे। काफी चलने के बाद वे पाताललोक पहुंच गए।

जब वे राजा बली के महल के द्वार पर पहुंचे तो द्वारपालों ने उनसे आने का प्रयोजन पूछा। विक्रम ने उन्हें बताया कि राजा बली के दर्शन के लिए मृत्युलोक आए हैं। एक सैनिक उनका संदेश लेकर गया और काफी देर बाद उनसे आकर बोला कि राजा बली अभी उनसे नहीं मिल सकते हैं। उन्होंने बार-बार राजा से मिलने का अनुरोध किया पर राजा बली तैयार नहीं हुए।
राजा ने खिन्न और हताश होकर अपनी तलवार से अपना सिर काट लिया। जब प्रहरियों ने यह खबर राजा बली को दी तो उन्होंने अमृत डलवाकर विक्रम को जीवित करवा दिया। जीवित होते ही विक्रम ने फिर राजा बली के दर्शन की इच्छा जताई। इस बार प्रहरी संदेश लेकर लौटा कि राजा बली उनसे महाशिवरात्रि के दिन मिलेंगे।




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