सिंहासन बत्तीसी : उन्‍नीसवीं पुतली रूपरेखा की कहानी

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बड़े भाई ने समय रहते उसे चेत जाने को कहा, लेकिन उसकी बातें उसे विष समान प्रतीत हुईं।

ये बुरी आदतें उसे बहुत तेजी से बरबादी की तरफ ले गईं और एक वर्ष के अन्दर वह कंगाल हो गया। वह अपने नगर के एक सम्पन्न और प्रतिष्ठित सेठ का पुत्र था, इसलिए उसकी बदहाली का सब उपहास करने लगे।

इधर भूखों मरने की नौबत, उधर शर्म से मुंह छुपाने की जगह नहीं। उसका जीना दूभर हो गया। अपने नगर में मजदूर की हैसियत से गुजारा करना उसे असंभव लगा तो वहां से दूर चला आया। मेहनत-मजदूरी करके अब अपना पेट भरता है तथा अपने भविष्य के लिए भी कुछ करने की सोचता है।
धन जब उसके पास प्रचुर मात्रा में था तो मन की चंचलता पर वह अंकुश नहीं लगा सका। धन बरबाद हो जाने पर उसे सद्बुद्धि आई और ठोकरें खाने के बाद अपनी भूल का एहसास हुआ। जब राजा ने पूछा, क्या वह धन आने पर फिर से मन का कहा करेगा तो उसने कहा कि जमाने की ठोकरों ने उसे सच्चा ज्ञान दे दिया है और अब उस ज्ञान के बल पर वह अपने मन को वश में रख सकता है।



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