अर्थ शुद्धि के लिए दान आवश्यक

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ने कहा था कि अर्थ की शुद्धि के लिए आवश्यक है। जिस प्रकार बहता हुआ पानी शुद्ध रहता है उसी तरह भी गतिशील रहने से शुद्ध होता है। धन कमाना और शुभ कार्यों में लगा देना अर्थ शुद्धि के लिए आवश्यक है। यदि धन का केवल एकमात्र संग्रह ही होता रहे तो संभव है एक दिन उसी नाव की तरह मनुष्य को डूबो देगा, जिसमें पानी भर जाता है। नाव का पानी उलीचा न जाए तो निश्चय ही वह डूब जाएगी।

हमारी भारतीय संस्कृति, में दान के महत्व के बारे में बहुत कुछ कहा गया है। दान को धर्म में एक जरूरी और श्रेष्ठ कार्य बताया गया है। अथर्ववेद में कहा है-'शतहस्त समाहार सहस्र हस्त किरः' अर्थात सैकड़ों हाथों से कमाओ और हजारों हाथों से बांट दो।

शास्त्रकारों ने ऐसा भी कहा है कि जो संपन्न व्यक्ति अपनी संपत्ति का भोग बिना दान के करता है वह श्रेष्ठ व्यक्तियों की श्रेणी में नहीं माना जा सकता।
यक्ष ने धर्मराज युधिष्ठिर से प्रश्न किया- 'मृत्यु के समय सब यहीं छूट जाता है, सगे संबंधी, मित्र कोई साथ नहीं दे पाते, तब उसका कौन मित्र होता है, कौन उसका साथ देता है? युधिष्ठिर ने कहा-'मृत्यु प्राप्त करने वाले का मित्र दान है, वही उसका साथ दे पाता है।

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यक्ष का अगला प्रश्न था 'श्रेष्ठ दान क्या है।' 'जो श्रेष्ठ मित्र की भूमिका निभा सके।' फिर प्रश्न था 'दानं परं किचं'? उत्तर था ' 'सुपात्र दत्तम' जो सत्पात्र या सुपात्र को दिया जाए।' जो प्राप्त दान को श्रेष्ठ कार्य में लगा सके, उसी सत्पात्र को दिया गया दान श्रेष्ठ होता है। वही पुण्य फल देने में समर्थ होता है।
धन के केवल संग्रह से भी अनेकों व्यक्तिगत और सामाजिक बुराइयां पैदा हो जाती हैं जिससे बोझिल होकर मनुष्य कल्याण पथ से भटक जाता है, जीवन की राह पर से फिसल जाता है। इसीलिए कमाने के साथ-साथ धन को दान के माध्यम से परमार्थ में उन्मुक्त होकर अभावग्रस्तों व सुपात्रों को दान देने का परामर्श हमारे शास्त्रकारों ने दिया है।



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