गुम न हो जाएँ गजराज

- संदीप सिसोदिया

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गजानन, गणपति का स्वरूप, भारत में पूज्य माने जाने वाले 'गजराज' आज अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए संघर्षरत हैं। भारतीय संस्कृति और धर्म के इस पवित्र प्रतीक को आज सबसे ज्यादा खतरा अपने पूजकों से है। कभी भारत हाथियों का स्वर्ग हुआ करता था, लेकिन शिकार, घटते जंगल और आहार में कमी के कारण इनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है...
लोभ के शिकार : इनसानों की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए जंगलों का अत्यधिक दोहन किया जा रहा है। आबादी के जंगलों की सरकने से, वन्य पशुओं के आने-जाने के रास्ते पर बढ़ते अतिक्रमण के चलते मनुष्य और पशुओं की मुठभेड़ बढ़ी है। इसका नतीजा अकसर वन्यजीवों के लिए ही नुकसानदायक होता है। कुछ सालों से सरकार को पूर्वोत्तर भारत के पड़ोसी देशों एवं लोगों से अपील करनी पड़ रही है क‍ि उनके गाँवों-खेतों में गलती से घुस आए हाथियों की हत्या न की जाए। हर साल बड़ी तादाद में हाथी दाँत की तस्करी होती है और जिसके लिए कई हाथियों को मार दिया जाता है।
टकराव के 'रास्ते' : समस्या यह है कि जंगल में बने हाथियों के प्राचीन रास्तों पर लोगों ने आबादी वाले गाँव बसा लिए हैं, जिस वजह से हाथी भारत वापस जाने के लिए अपना रास्ता नहीं ढूँढ पा रहे हैं और इसलिए हिंसक हो रहे हैं। ये हाथी थाईलैंड से भूटान की ओर जाते हैं और भारत का पूर्वोत्तर हिस्सा उनके रास्ते में पड़ता है।

मगर अधिकारियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में हाथियों की संख्या बढ़ी है, ताजा आँकड़ों के मुताबिक भारत में वर्तमान में 25 हजार के लगभग हाथी हैं। इसी वजह से हाथी अलग-अलग रास्तों से जंगलों में घुसने की कोशिश करते हैं। यह समस्या सिर्फ बांग्लादेश, थाईलैंड या भूटान की ही नहीं, बल्कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की भी है। सिर्फ असम में ही पिछले 15 वर्षों में हाथियों ने 600 से अधिक लोगों की जान ली है।
कौन किसके रास्ते में?
हाथियों के अकसर आबादी वाले इलाके में घुसने से जानमाल का बड़ा नुकसान भी होता है, पर इस घुसपैठ का कारण ढूँढने के लिए पहले ये सोचना होगा कि हाथी हमारे इलाकों में घुस आए हैं या फिर हम ही उनके इलाके में घुस गए हैं।
प्रजनन, मौसम की मार से बचने व खाने की तलाश में वन्य जीव हर साल एक निश्चित अवधि या मौसम में एक इलाके से दूसरे इलाके की ओर जाते हैं। इस प्रक्रिया को आव्रजन कहा जाता है। ये हाथी हर साल थाईलैंड से भूटान की तराई में जाते हैं, जिसके बीच पूर्वोत्तर भारत का हिस्सा पड़ता है। हर साल यह हाथी रास्ते में आने वाले कई गाँव उजाड़कर कई लोगों को मार देते हैं और कई लोग इन मुठभेड़ों में घायल भी हो जाते हैं।
पूर्वोत्तर भारत में जंगली हाथी अच्छी-खासी संख्या में पाए जाते हैं और सिर्फ असम में इनकी संख्या 5000 से अधिक बताई जाती है, लेकिन जैसे-जैसे असम में लोगों की आबादी बढ़ती गई, लोगों ने ऐसे इलाकों में पाँव पसारने शुरू कर दिए, जो हाथियों के आने-जाने के रास्ते थे। नतीजतन हाथी रास्ते में आने वाले गाँवों में तबाही मचा देते हैं, जिसका भुगतान उन्हें अपनी जान देकर करना पड़ता है। हाथियों के उपद्रव से भड़के लोग इन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं और कभी गुड़ में जहर रखकर तो कभी शिकारियों को बुलाकर हाथियों की जान ले लेते हैं।
संवेदनशील प्राणी : हाथी एक सामाजिक प्राणी है और झुंड बनाकर रहता है। यह प्राणी काफी संवेदनशील होता है। हाथी की याददाश्त काफी तेज मानी जाती है, यहाँ तक कि अपने झुंड के किसी सदस्य के मारे जाने पर अकसर हाथी गुस्से में आकर तबाही मचा देते हैं। भारतीय हाथी (एलिफास मैक्सिमस इंडिकस) एशियाई हाथी की चार उपजातियों में से एक है। भारत के अलावा हाथी बांग्लादेश, पाकिस्तान ,भूटान, कंबोडिया, चीन, लाओस, मलेशियाई प्रायद्वीप, म्यांमार, नेपाल, थाईलैंड और वियतनाम में भी पाया जाता है।
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ताजे अध्ययनों में सैटेलाइट से मिली तस्वीरें बताती हैं कि असम में 1996 से 2008 के बीच जंगल की लगभग चार लाख हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर गाँव वालों ने अतिक्रमण कर आबादी बसा खेती-बाड़ी शुरू कर दी है। इस क्षेत्र में हाथियों के प्राचीन आव्रजन मार्ग भी आते हैं। जैसे ही हाथियों के प्रजनन का मौसम शुरू होता है, हाथी इन रास्तों पर अपनी यात्रा शुरू कर देते हैं।
प्रजनन के मौसम में कई बार नर हाथी कामांध हो अत्यधिक उत्तेजित हो जाते हैं और बेकाबू हो कर सामने आने वाली हर चीज को तहस-नहस कर देते हैं। इस अवस्था को 'मस्त' कहते हैं, मस्ताने हाथी अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के लिए आपस में लड़ाई तो करते ही हैं साथ ही पेड़ों इत्यादी को उखाड़ कर फेंक देते हैं। यहाँ तक की इन हाथियों द्वारा कई बार गैंडो को भी मार देते के किस्से भी सामने आए हैं।
हाथियों के अकसर आबादी वाले इलाके में घुसने से जानमाल का बड़ा नुकसान भी होता है, पर इस घुसपैठ का कारण ढूँढने के लिए पहले ये सोचना होगा कि हाथी हमारे इलाकों में घुस आए हैं या फिर हम ही उनके इलाके में घुस गए हैं। पर हर समस्या की तरह इस समस्या का भी हल है। अब जरूरत है ऐसे उपायों की जिनसे हाथियों की इन गाँव वालों से मुठभेड़ को टाला जा सके।
'कुंकी' करेंगे काबू : पूर्वोत्तर भारत के राज्य असम में जंगली हाथियों के नियंत्रण के लिए 'कुंकी' नाम से जाने जाने वाले पालतू हाथियों की मदद ली जा रही है। असम और पश्चिम बंगाल के बहुत से इलाकों में अकसर उग्र हाथियों के झुंड खेतों, गाँवों और लोगों पर हमला कर भारी तबाही मचाते हैं।

विशेषज्ञों ने उग्र हाथियों को पालतू हाथियों के जरिये घेरकर उन्हें रास्ते पर लाने की कोशिश की है। इसके नतीजे भी सार्थक निकले हैं। सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में इस रणनीति को अपनाया गया, वहाँ हाथियों की हिंसा से मरने वालों की संख्या में आश्चर्यजनक रुप से कमी हुई है। इस परियोजना के अधिकारी जंगली हाथियों के झुंड की गतिविधियों पर नजर रखते हैं और उनको पालतू हाथियों से घेरकर गाँव से दूर रखते हैं।
इस योजना को वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड से भी मदद हासिल है। हाथियों को भगाने के क्रूर पारम्परिक तरीकों जैसे करंट लगाना, फन्दे कसना और बम फोड़ना आदि से यह रणनीति काफी कारगर सिद्ध हुई है और वन्यजीव प्रेमी भी इस पहल से उत्साहित हैं।

सुरक्षित गलियारा : हाथियों की बढ़ती समस्या के बाद भारत में अब कोशिश की जा रही हैं कि दो जंगलों के बीच एक कॉरिडोर (गलियारा) विकसित कर उसका संरक्षण किया जा सके। सुरक्षित रास्ता देने के लिए हाथियों के कॉरिडोर पर तैयार की गई रिपोर्ट पर लगभग सभी बड़े विशेषज्ञों की राय ली गई थी तथा उम्मीद है कि इससे हाथियों को जंगलों में ही रोकना संभव होगा और उनके आबादी वाले इलाकों में घुसने की घटनाओं में कमी आएगी।
भारत में ऐसे 88 गलियारों की पहचान की गई है और उन पर कुछ स्वयंसेवी संस्थाएँ सरकार के साथ मिलकर काम भी कर रही हैं, पर भारत में वन्यजीवों के रहवास के लिए किए जा रहे सभी प्रयासों में एक समस्या मुँह बाए खड़ी रहती है, वह है बढ़ती जनसंख्या की। लगातार बढ़ती जनसंख्या और जंगल पर बढ़ते दबाव ने पिछले कुछ दशकों में हाथियों की समस्या को बढ़ाया है।
इसके लिए देखना होगा कि हाथी दो जंगलों के बीच जिन इलाकों का उपयोग ऐतिहासिक रूप से करते रहे हैं, वहाँ कितने गाँव हैं, आबादी का कितना घनत्व है इत्याद‍ि। दरअसल यही वो इलाके हैं जिन्हें विशेषज्ञ कॉरिडोर कहते हैं और इनके बंद हो जाने के कारण हाथियों ने मानव रहवासी क्षेत्रों में घुसपैठ कर मुसीबतें बढ़ा दी हैं।

देश के विभिन्न राज्यों में स्थित इन गलियारों को अब हाथियों के आवागमन के लिए संरक्षित करने की कोशिश की जा रही है। इस योजना से वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया, इंटरनेशनल फंड फॉर एनिमल वेलफेयर, यूएस विश एंड वेलफेयर सर्विस और एशियन नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन जुड़े हैं। इसके अलावा गलियारों के संरक्षणों के लिए केंद्र और राज्य सरकार की भी सहायता ली जा रही है।
उम्मीद की किरण : पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इस दैवतुल्य प्राणी को भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग बताते हुए जल्द ही राष्ट्रीय धरोहर प्राणी घोषित किया जाने की बात कही थी। उनका कहना है कि हम जल्द ही हाथी को राष्ट्रीय धरोहर प्राणी घोषित करेंगे क्योंकि वे युगों से हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं। इन विशाल प्राणियों का संरक्षण करने के लिए हमें इन्हें बाघों की तरह ही अहमियत देने की जरूरत है। साथ ही उन्होने बताया कि एनटीसीए की तर्ज पर राष्ट्रीय हाथी संरक्षण प्राधिकरण का मार्ग प्रशस्त करने के लिए ‘वन्य जीव (संरक्षण) कानून’ में भी संशोधन करने की जरूरत है।
अब उम्मीद यही है कि इन गलियारों को 'राजकीय गलियारा' घोषित कर दिया जाए और लोगों को जानकारी दी जाए कि इन इलाकों में विकास कार्य नहीं किए जा सकते। अब ऐसे इलाकों में लोगों को सिर्फ हाथियों से बचना ही नहीं है, हाथियों को बचाना भी जरूरी है। यह जागरूकता प्राकृतिक संतुलन कायम करने के लिए सबसे जरूरी है। धरती पर विघ्नकर्ता गजानन के प्रत्यक्ष रूप को पूजने का सबसे अच्छा तरीका यही होगा कि उसे उसका प्राकृतिक आवास फिर लौटा दिया जाए।


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