जंगलों पर माफिया का शिकंजा

DW| पुनः संशोधित मंगलवार, 29 अप्रैल 2014 (10:57 IST)
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चुनाव का मौसम है, लेकिन मौसम अक्सर दगा दे रहा है। संतुलन बिगड़ रहा है और इसके लिए स्थानीय राजनीतिज्ञ भी जिम्मेदार हैं। जंगल लगातार काटे जा रहे हैं और बचे खुचे जंगल पर माफिया का कब्जा होता जा रहा है।

बैसाख के तपते दिनों में अचानक बादल छाए और बारिश होने लगी तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का हेलीकॉप्टर उड़ान नहीं भर सका और उन्हें अपने बेटे राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र में जनसभा को सम्बोधित करने सड़क मार्ग से जाना पड़ा। वहां उनके लिए जो मंच बनाया गया था वह भी आंधी पानी में तबाह हो गया।

बीएसपी प्रमुख मायावती को भी खराब मौसम के कारण मैनपुरी और फर्रूखाबाद की जनसभाओं को सम्बोधित करने के लिए सड़क मार्ग का ही सहारा लेना पड़ा। समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव की भी इटावा और कानपुर की सभाएं खराब मौसम के कारण रद्द करनी पड़ीं।
दगा दे रहा मौसम : पिछले सालों में उत्तरप्रदेश में मौसम का साइकल तेजी से बदल रहा है। जब धूप खिलनी चाहिए तब बारिश होने लगती है और जब सर्दी पड़नी चाहिए तो गर्मी छा जाती है। यूपी में जितनी हरियाली है वह पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखने में नाकाम साबित हो रही है।

मीलों दूर सड़क किनारे कहीं छांव के लिए कोई पेड़ इन दिनों नजर नहीं आता। उत्तराखंड के गठन से यूपी का वन क्षेत्र 35,651 वर्ग किलोमीटर कम हो गया। बचा सिर्फ 21,833 वर्ग किलोमीटर, जो यूपी जैसे विशाल 2 लाख 40 हजार 928 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले राज्य के पर्यावरण के लिए नाकाफी है।
उस पर सितम यह कि इस बचे खुचे वन क्षेत्र के 30 फीसदी भू-भाग पर भी माफिया का कब्जा है, जिससे जंगल को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। यूपी स्टेट बायोडायवर्सिटी बोर्ड ने अपनी एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी है। रिपोर्ट के मुताबिक करीब 30 फीसदी वन क्षेत्र को रिजर्व नहीं किया जा सका है और यह जंगल सीधे तौर पर लकड़ी की जरूरतों को पूरा करने के लिए माफिया के शिकंजे में हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में सिर्फ 15,350 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को ही वन विभाग रिजर्व कर सका है। स्टेट बायोडाइवर्सिटी बोर्ड ने यह रिपोर्ट फारेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया और यूपी रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन सेंटर के आंकड़ों के आधार पर तैयार की है। लगातार पौधारोपण अभियान के बावजूद यूपी का ग्रीन कवर सिकुड़ता जा रहा है।

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति और सुप्रीम कोर्ट कुल भौगोलिक क्षेत्र के 33 प्रतिशत को ग्रीन कवर बनाने की बात कहते हैं। राष्ट्रीय औसत करीब 24 प्रतिशत है लेकिन यूपी का ग्रीन कवर सिर्फ 9।01 फीसदी ही बचा है। वन विभाग की विशेष सचिव प्रतिभा सिंह इस बारे में कहती हैं कि जंगलों के साथ वाइल्डलाइफ को भी बचाया जाना चाहिए।
जंगल रक्षा की कोशिश : जंगलों को बचाने के लिए दूसरे विभागों की मदद ली जा रही है। जंगल बढ़ भी रहे हैं। लेकिन माफिया वाले मामले पर वह कुछ भी बोलने को तैयार नहीं। रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन सेंटर के अध्यक्ष कुलदीप उज्जवल के अनुसार कोशिश की जा रही है कि खेती के साथ वनों को भी नुकसान नहीं हो।

लखनऊ यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर और वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञ डॉ. अमिता कनौजिया का कहना है कि वनों के असुरक्षित होने से जंगली जानवरों का पूरा हैबिटेट ही बदल गया है। मौसमों के बदलाव के अलावा जंगल की फूड चेन भी बुरी तरह से प्रभावित हो रही है जिसका खामियाजा आम आदमी पर्यावरणीय असंतुलन और जंगली जानवरों के शहरों में आने के रूप में भुगत रहा है।
पुलिस और वन विभाग के अफसर जंगलों पर माफिया के कब्जे को लेकर कुछ भी नहीं बोलते। आधुनिक उद्योगों के न होने के कारण जंगलों की अवैध कटाई पिछड़े इलाकों में आर्थिक गतिविधियों का साधन हो गए हैं। किसी भी राजनीतिक पार्टी की प्राथमिकता में जंगल और पर्यावरण नहीं हैं। किसी के घोषणापत्र में इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है, जबकि सत्ता और प्रशासन से माफिया को मिल रहे संरक्षण के बिना जंगलों की अंधाधुंध कटाई संभव नहीं है।
लखनऊ के दुबग्गा के पास लकड़ी कटान वाले बताते हैं कि जितनी लकड़ी बाजार में आती है उसमें 85 प्रतिशत अवैध होती है। यूपी के हर वन क्षेत्र के आस पास वन चौकियां बनी हुई हैं, जिनसे निकलने पर हर वाहन की जांच का प्रावधान है, लेकिन वह खानापुरी साबित हो रही हैं। जंगली लकड़ी का आवागमन किसी भी सुबह सूरज निकलने से जरा पहले किसी भी शहर की सीमा पर बने लकड़ी की आढ़तों के पास देखा जा सकता है।
रिपोर्ट: एस. वहीद, लखनऊ
संपादन: महेश झा



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