इंटरनेट से चमकती नेतागिरी

DW|
एलके आडवाणी हों, नरेंद्र मोदी, अमरसिंह या फिर शशि थरूर। ज्यादा से ज्यादा राजनेता अपनी छवि को चमकाने और अपनी बात लोगों तक पहुँचाने के लिए का सहारा ले रहे हैं और खासकर युवाओं को लुभा रहे हैं।

इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले राजनेताओं में सबसे ज्यादा नाम विदेश राज्यमंत्री का आता है, जो खासे विवादों में भी रहे हैं। सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर सरकार की नीतियों की आलोचना करने पर उन्हें अपने बॉस से भी सुनना पड़ी, लेकिन ट्वीट करने का उनका जज्बा कम नहीं हुआ।
खैर, भारत में वेबसाइट तैयार करने वाली एक कंपनी के मुखिया पुष्कर श्रीवास्तव राजनेताओं में इंटरनेट के बढ़ते चलन पर कहते हैं, दरअसल भारत की 50 प्रतिशत आबादी युवा है, जो टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हैं, इसलिए राजनेता भी उन्हें लुभाने के लिए इंटरनेट को सबसे अच्छा माध्यम मान रहे हैं।

24 साल के सैफ इकबाल नियमित रूप से इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं। वे कहते हैं कि राजनेता युवा और छात्रों को अपनी तरफ खींचने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं।
इंटरनेट का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने वालों में नेताओं की युवा ब्रिगेड ही शामिल नहीं है, बल्कि उम्रदराज और अनुभवी नेता भी इसकी अहमियत समझ रहे हैं। क्योंकि इससे उन युवा वोटरों तक भी पहुँचा जा सकता है, जिनके बारे में कहते हैं कि उनकी राजनीति में कोई खास दिलचस्पी नहीं है।

दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान के प्रोफेसर आनंद प्रधान कहते हैं-पढ़ा-लिखा मध्यम वर्ग आगे बढ़ रहा है। वह जनमत को भी प्रभावित कर रहा है, ऐसे में उस तक पहुँचने के लिए रैलियाँ और बैठकें जैसे पारपंरिक तरीके अब कारगर नहीं रहे। लेकिन इंटरनेट साइटों पर नेताओं को नौजवान लोगों के सवालों के जवाब देने पड़ते हैं तो यह असरदार है।
हालाँकि कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में एमए कर रहे देबोज्योति बिश्बास इस बात से सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं कि इंटरनेट के मुकाबले लोगों तक पहुँचने के पारंपरिक तरीके कहीं ज्यादा प्रामाणिक हैं। इंटरनेट पर राजनेता चुन सकते हैं कि उन्हें किस सवाल का जवाब देना है, किसका नहीं। उनके मुताबिक-वे अनदेखी कर सकते हैं, लेकिन अगर कोई आमने-सामने हो तो ऐसा कम ही होगा कि सवाल का जवाब न मिले।
मीडिया एक्सपर्ट प्रधान मानते हैं कि पारपंरिक रूप से राजनेताओं तक आम लोगों की पहुँच वैसे भी कम ही रही है। ऐसे में ब्लॉगिंग, ट्विटर, के अलावा खासतौर से बनाई गई वेबसाइटों का चलन अच्छी शुरुआत है। इसके जरिए युवा लोग राजनीति का हिस्सा बन रहे हैं और लोकतंत्र को मजबूती मिल रही है।
रिपोर्टः देबारती मुखर्जी

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