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Written By वार्ता
पुनः संशोधित रविवार, 6 अप्रैल 2008 (18:49 IST)

महँगाई से उलझन में सरकार

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और घरेलू बाजार में चढ़ती महँगाई ने सरकार के समक्ष नई चुनौती खड़ी कर दी है।

महँगे होते खाद्यान्नों के दाम पर अंकुश लगाने के लिए सरकार ने खाद्य तेलों पर आयात शुल्क पूरी तरह समाप्त कर दिया है तो गेहूँ और दाल-दलहन के शुल्क मुक्त आयात की अवधि एक साल और बढ़ा दी है लेकिन कच्चे तेल के चढ़ते दाम से जहाँ एक तरफ तेल कंपनियों का नुकसान बढ़ता जा रहा है वहीं दूसरी तरफ महँगाई का बोझ कम करने के लिए इस पर शुल्क घटाने का दबाव भी बढ़ता जा रहा है।

पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कच्चे तेल के आयात पर सीमा शुल्क पूरी तरह समाप्त करने की माँग की। कच्चे तेल के आयात पर इस समय 5 प्रतिशत सीमा शुल्क लागू है लेकिन जानकारों का कहना है कि पहले से ही भारी घाटे में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की बिक्री कर रही तेल कंपनियाँ क्या इस कमी का लाभ उपभोक्ता तक पहुँचा पाएँगी। घरेलू उपयोग के लिए रसोई गैस और राशन में बिक्री के लिए मिट्टी तेल का आयात पहले ही पूरी तरह शुल्क मुक्त है।

देवड़ा ने स्वंय स्वीकार किया है कि आयात लागत से कम दाम पर पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और मिट्टी तेल की बिक्री कर रही तेल कंपनियों को वित्त वर्ष 2008-09 में 130000 करोड़ रुपए का भारी नुकसान होने की आशंका है। समाप्त वित्त वर्ष 2007-08 में इन कंपनियों का इस प्रकार का घाटा 77304.50 करोड़ रुपए तक रहने का अनुमान लगाया गया है। तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे को देखते हुए तुरंत राहत भरे कदम उठाए जाने की जरूरत है।

पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री करने वाली तेल कंपनियों को वर्तमान खुदरा कीमत पर पेट्रोल में 10.90 रुपए और डीजल में 14.66 रुपए प्रति लीटर का नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसी प्रकार घरेलू रसोई गैस कंपनियाँ 303.65 रुपए के नुकसान पर बेच रही है जबकि राशन में मिट्टी तेल की बिक्री पर उन्हें प्रति लीटर 21 रुपए का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में जिस तेजी से कच्चे तेल के दाम लगातार 100 डॉलर से ऊपर बने हुए हैं, ऐसी स्थिति में घरेलू बाजार में उपभोक्ता को इन्हें घटी कीमतों पर उपलब्ध कराना तेल कंपनियों और सरकार दोंनों के लिए काफी मुश्किल काम है।