स्वर्ग तुल्य होता है संस्कारवान परिवार...

संतानोत्पत्ति का रहस्य क्या है?

WD|

इस विषय को तनिक स्पष्ट करूं। उदाहरणार्थ - एक बिल्ली है। उसने अपने असमर्थ और प्यारे बच्चे के लिए कटोरी में मलाई रखी। बच्चा हाथ में लेकर उसे खाना चाहता है। बिल्ली झपटी और सारी मलाई छीन ले गई। वैसे तो एक असहाय, अबोध बच्चे के ऊपर बिल्ली का यह व्यवहार अत्याचार हुआ, परंतु बिल्ली के कर्मों की व्यवस्था, बुद्धि की कमी के कारण उस बिल्ली पर नहीं। इसलिए उसका यह कर्म उसे निंदनीय ठहराने के लिए उपयुक्त नहीं होगा।

दूसरा उदाहरण देखे तो- एक बुढ़िया बड़ी कठिनाई से रोटी पका रही है। आंख में धुआं लग रहा है। अभी 4-5 रोटी बन चुकी हैं और इतने में ऊपर से एक बंदर आया और उसकी रोटियां मुख में दबाकर चला गया। यह बंदर के लिए पाप कर्म नहीं है? इसका दंड उसे नहीं भुगतना पड़ेगा। इस भोग योनि के प्राणियों में वृद्धि के कमी के कारण उनके आचार की व्यवस्था ईश्वर ने सीधी अपने हाथों में रखी है।
जैसे बहुत छोटे बालकों पर बुद्धिमान पिता उनकी व्यवस्था का भार नहीं छोड़ता। हां, विद्वान और परिपक्व संतान अपना विधान अपने आप बनाने में स्वतंत्र है। आपने कभी किसी इंजीनियरिंग कॉलेज में बया पक्षी को घोंसला बनाने के लिए शिक्षा प्राप्त करते न देखा होगा, परंतु कितनी उच्च कला और कारीगरी बिना सीखे उसे प्राप्त है। मधुमक्खी के छत्ते में कितनी कुशलता दिखाई देती है, परंतु क्या उसे किसी विद्यालय में इसकी दी गई है।
चींटियां कितनी परिश्रमी और समझदार होती हैं, परंतु क्या उन्हें वेद की ऋचाओं और गीत के उपदेशों से शिक्षित किया गया है? परंतु मनुष्य को द्वारा सब ट्रेनिंग दी जाती है। माता, पिता और आचार्य बच्चे के ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करते हैं, उसे शिक्षित और दीक्षित करते हैं



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