जिसे दुनिया कमलेश्वर के नाम से जानती है

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- मनीषा पाण्डेय

इस वर्ष की शुरुआत ही साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति के साथ हुई है। अभी हम निर्मल वर्मा और भीष्म साहनी के दुख से उबरे भी नहीं थे कि कमलेश्वर ने भी हमें अलविदा कह दिया। साहित्य में एक नवीन धारा का सूत्रपात करने और 'राजा निरबंसिया' और 'कितने पाकिस्तान' जैसी रचनाओं से हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाले साहित्यकार कमलेश्वर नई कहानी आंदोलन के प्रमुख स्तंभ थे।

कमलेश्वर ने हिंदी साहित्य के लगभग 6 दशकों के विकासक्रम को बहुत करीब से देखा था। आजादी के बाद हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में जिस नई कहानी आँदोलन और प्रगतिशील विचारधारा का सूत्रपात हुआ, राजेंद्र यादव और कमलेश्वर जैसे लोग उसमें अग्रणी थे। कमलेश्वर ने 'नई कहानियाँ का संपादन भी किया। उनके संपादकत्व में पत्रिका ने सफलता के नए आयाम छुए।
कमलेश्वर के लेखन के कई पहलू हैं। उसमें फिल्म के लिए पटकथा और संवाद-कहानी से लेकर 'समुद्र में खोया हुआ आदमी' और अभी कुछ ही वर्ष पहले आया उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' तक शामिल है। कमलेश्वर के साहित्यकार व्यक्तित्व और उनकी कलम के जिक्र के बगैर हिंदी साहित्य का पाठ पूरा नहीं होता। उनके निधन पर गहरा दुख प्रकट करते हुए नई कहानी आंदोलन के उनके साथी और साहित्यकार राजेंद्र यादव लिखते हैं, कमलेश्वर का जाना मेरे लिए हवा-पानी के छिन जाने की तरह है। साहित्य जगत में उनके जैसे बहुमुखी और करिश्माई व्यक्तित्व के लोग कम ही हुए हैं।
कमलेश्वर के भीतर एक लेखक, कथाकार, अनुवादक, संपादक और पटकथा लेखक, फिल्मकार और आँदोलनकर्मी, सबकुछ समाया हुआ था। ये समस्त भूमिकाएँ उन्होंने साथ-साथ निबाहीं। उन्होंने कई सौ कहानियों, लगभग दस लघु उपन्यास और एक वृहदाकार उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' का सृजन किया। उनकी कहानी 'राजा निरबंसिया' नई कहानी आंदोलन का आधार-स्तंभ मानी जाती है।
एक संपादक के रूप में भी हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में कमलेश्वर ने महती भूमिका निभाई। उन्होंने 'नई कहानियाँ ', 'कथा-यात्रा' और 'सारिका' जैसी हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं का संपादन किया। कोरे शब्द-विन्यास और कलात्मक वैचित्र्य से ऊपर उठकर उन्होंने साहित्य में वैचारिकता के समावेश के लिए प्रयास किया। इन पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने सार्थक रचनाकारों की पूरी एक पीढ़ी तैयार की।
कमलेश्वर के साथ विकसित हुए नई कहानी आंदोलन की मुख्य वैचारिक प्रेरणा आर्थिक गैरबराबरी का विरोध, वर्ग-संघर्ष, मनुष्य-मनुष्य के बीच समानता की पक्षधरता, साँप्रदायिक सौहार्द्र और जाति-धर्म के समस्त विभेदों का नकार था। यह साहित्य में प्रगतिशील धारा की मुखर शुरुआत थी। कमलेश्वर समेत इस दौर कि समस्त साहित्यकारों ने लेखन को प्रगतिशील विचारों के प्रसार का माध्यम बनाया।
इन वैचारिक प्रेरणाओं के साथ-साथ कमलेश्वर का साहित्य संवेदना और भावना की दूसरी ही भावभूमि पर खड़ा है। 'समुद्र में खोया हुआ आदमी' इस संवेदना का प्रतिनिधित्व करता अपनी तरह का पहला उपन्यास था। यह बरसों बाद घर लौट रहे एक नेवी ऑफीसर की कहानी है, जिसका पूरा परिवार बेसब्री से उसके आने का इंतजार कर रहा है। अंततथ वो तो नहीं आता, लेकिन आती है समुद्र में उसके खोने की खबर।
इस उपन्यास में कमलेश्वर ने उस परिवार मनोदशा का जैसा चित्र खींचा है, वैसा खुद कमलेश्वर भी अपनी बाद की रचनाओं में नहीं कर पाए। कमलेश्वर के भीतर एक सृजनकर्ता और वैचारिक रूप से उन्नत एक प्रबुद्ध पत्रकार साथ-साथ क्रियाशील रहे हैं। उनके भीतर के लेखक ने उनकी वैचारिकता को और विचारों और दर्शन की गहराई ने रचनात्मकता को हमेशा नई दिशा और प्रेरणा दी।
जीवन के अंतिम क्षणों तक कमलेश्वर निरंतर सृजनशील थे। वे 'कितने पाकिस्तान' का भी दूसरा भाग लिख रहे थे। अपनी अंतिम सांसों तक जीवन की जय में जुटा ये शख्स, जिसे दुनिया कमलेश्वर के नाम से जानती है, वह कमलेश्वर ही हो सकता था, 'कितने पाकिस्तान' का सृजनकर्ता, राजा निरबंसिया के वंश की तलाश करता, समुद्र में खोए आदमी के दुख से कातर, बूढ़ी माँ के दुखों से विह्वल। कमलेश्वर का स्थानापन्न नहीं हो सकता।



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