सरसों : ग्रामीण वनस्पति

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सरसों का उपयोग ज्यादातर तेल निकालने में किया जाता है, इसका शाक भी बनाया जाता है। विशेषकर पंजाब और उत्तरी भारत में मक्का की रोटी के साथ सरसों का शाक बहुत रुचिपूर्वक खाया जाता है। सरसों का उपयोग घरेलू इलाज में भी किया जा सकता है।

गुण : सरसों रस और विपाक में चरपरा, स्निग्ध, कड़वा, तीखा, गर्म, कफ तथा वातनाशक, रक्तपित्त और अग्निवर्द्धक, खुजली, कोढ़, पेट के कृमि आदि नाशक है।

परिचय : इसकी उत्पत्ति सारे भारत में होती है, इसे अक्टूबर के आरंभ में बोया जाता है और फरवरी-मार्च में इसकी कटाई हो जाती है। इसका तेल 'कड़वा तेल' भी कहा जाता है।

उपयोग : * इसके बीज और तेल औषधि एवं खाद्य रूप में प्रयोग किए जाते हैं।

* सरसों का तेल वातनाशक और गर्म होता है, अतः वातजन्य दर्द दूर करने के लिए इसकी मालिश करना गुणकारी होता है। जोड़ों का दर्द, मांसपेशियों का दर्द, गठिया बाय का दर्द, छाती का दर्द, ब्रोंकाइटिस का कष्ट इसकी मालिश से दूर होता है।

* इसके तेल को गर्म करके 2-2 बूंद टपकाने से वातजन्य कान का दर्द ठीक होता है।

* सरसों के दानों को दूध में डालकर उबालें। जब दूध जल जाए, तब सरसों को सुखाकर पीस लें। इस चूर्ण को पानी में गीला कर उबटन बना लें। इस उबटन को शरीर पर लगाकर मसलें व स्नान कर लें। इस प्रयोग से त्वचा के रंग में निखार आता है।

* कफयुक्त खाँसी को ठीक करने के लिए सरसों को पीसें और शहद में मिलाकर थोड़ा-थोड़ा दिन में 3-4 बार चाटें।

* सरसों और बाउची के बीज को सम भाग लेकर पानी में पीस लें। इसका लेप सूजन पर लगाने से सूजन उतर जाती है।

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* मसूढ़े पिलपिले हो गए हों, उनसे खून व पस आता हो और वे दर्द करते हों, मुँह से दुर्गन्ध आती हो तो 1-2 चम्मच सरसों का तेल और आधा चम्मच महीन पिसा हुआ नमक मिलाकर मुँह में रख लें। इसे आधा घण्टे तक मुँह में रखना है और मुँह में लार बढ़े तो थोड़ा-थोड़ा थूकते रहना है। तेल को मुँह के अन्दर ही इधर-उधर घुमाते रहें। आधा घंटे बाद सब थूक दें और 10-15 मिनट तक थूकते रहें। पानी से कुल्ला न करें। यह प्रयोग बहुत ही प्रभावशाली है। लाभ न होने तक प्रयोग जारी रखें।

 

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