बचपन के इक बाबूजी थे

27 नवंबर हरिवंशराय बच्चनजी की जन्म शताब्दी पर विशेष

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बेहद भाग्यशाली हूँ मैं- में तमाम तरह की आर्थिक तंगियों के बावजूद बाबूजी और माँ हमारे ढीठ आग्रह पूरे करते थे, सांसारिक मनपसंद चीजें मुहैया कराते रहते थे। धन्य हैं वे कि व्यक्तिगत कठिनाइयाँ उठाकर भी उन दोनों ने हमें वह सब कुछ दिया जो हमने माँगा।

और जीवन की आइसी देखिए कि ईश्वर की कृपा से और माँ-बाबूजी के आशीर्वाद से जब हमारी स्थिति ऐसी हुई कि हम उन्हें वह सब कुछ दे सकें जो वे चाहें, तो उन्होंने हमसे केवल इतना कहा- 'बेटा, हमें कुछ नहीं चाहिए, बस, दिन में एक बार हमसे मिल लिया करो।' अमिताभ की आवाज गीली हो आई थी। वे ज्यादा भावुक न हो उठें तो उन्हें फिर बचपन में लौटा ले जाने की गरज से मैंने कहा- यह तो हम सब मित्र परिवार जानते रहे हैं कि बच्चनजी रोज सुबह और शाम को खूब लंबी-लंबी दूरी तक टहलने जरूर जाते थे। तुम्हें भी साथ ले जाते थे कभी?

अमिताभ के मुँह पर फिर वही मासूम बचपन खिल आया और बोले- 'हाँ, सुबह की सैर पर साथ ले जाते थे। जब मैं इलाहाबाद में था, छोटा था, तब पता है आपको मेरे लिए तो वे सुबहें बड़ी डरावनी होती थीं। क्योंकि वे चलते-चलते मुझसे गणित के पहाड़े कहने को बोलते थे। दस तक तो किसी तरह मैं संभाल लेता था। दस के बाद बड़ा कठिन होता। हर गलती पर एक चपत पड़ती और हर चपत पर मैं आशा करता कि घर जल्दी आए और मेरी यह पीड़ा मिटे!'
अमिताभ को अचानक कुछ याद आया-उस याद से उनकी आँखों में जो चमक कौंधी उसे देखकर हर व्यक्ति जिसके पास माँ या पिता का दिल है उसे प्यार आ ही जाएगा। चमकती आँखें औ खुली घुली हँसी के साथ बोले- 'यह सैर अलग होती थी, पर बाबूजी के साथ दशहरे पर शहर भरमें घूमने में जो मजा आता था वैसा... सारी दुनिया जहान घूम आए पर वैसा सुख कभी नहीं मिला।

दशहरे के दिनों में बाबूजी का उत्साह देखने लायक होता था। तब इलाहाबाद में रामलीलाएँ खूब होती थीं और राम की कथा से संबंधित खूब झाँकियाँ निकलती थीं। बाबूजी मुझे उँगली पकड़कर साथ चलाते। थक जाऊँ तो अपने कंधे पर बिठा लेते, कभी पीठ पर लाद लेते, कभी-कभी तो भीड़ ज्यादा हो तो कोहनी से ठेल-ठालकर मेरे लायक सुरक्षित जगह बनाते हुए मुझे एक-एक चौकी दिखाते और जिस संदर्भ की चौकी होती वह कथा सुनाते चलते।'
मैंने कहा- हाँ रामचरित मानस के प्रति अगाध आस्था तो उन्हें अपने पुरखों से विरासत में मिली थी। तुम लोगों तक भी उन्होंने इस परंपरा के बीज डाले हैं। मैंने पूछा- क्या अभिषेक भी इन परंपराओं को निभाएँगे?

अमिताभ बोले-'हाँ जरूर निभाएँगे। निभाते हैं। आप तो कई बार पूजा पर हमारे घर आई हैं। आपने देखा होगा, माँ और बाबूजी पूजा का पाखंड नहीं करते थे- हमारा अपना एक अलग ढंग होता है, जिसमें रामचरित मानस का सब मिलकर पाठ जरूर करते हैं। ये हमारी व्यक्तिगत आस्था है- अच्छा लगता है। समस्त परिवार मिलकर प्रार्थना करे तो पारिवारिक यूनिटी की एकाग्रता भी मिलती है। फैमिलीज दैट प्रे टुगैदर स्टे टुगैदर। इस बात में हम सब आस्था रखते हैं। अभिषेक भी रखते हैं- आगे भी जरूर रखते रहेंगे।'



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