इतिहास की जरूरत किसे है?

इतिहास हमारी आँखें खोलता है। मानवीय गतिविधियाँ कई तरह से कई स्तरों पर चलती रहती हैं। इतिहास उनके अर्थ खोलता है और उनमें रुझान और प्रवृत्तियाँ ढूँढता है। वह तमाम घटनाओं को तरतीब से इकट्ठा करता है, उन्हें आपस में जोड़ता है और उनकी व्याख्या करता है।
जैसे लोकतांत्रिक देश में इस तरह के इतिहास लेखन की जरूरत निस्संदेह सबसे ज्यादा होना चाहिए। इतिहास हमारे मन में बसी मूर्तियों को तोड़ता है और फिर से गढ़ता है, क्योंकि इतिहासकार के पास अपने ब्योरे नहीं होते, वह बीती हुई घटनाओं के उपलब्ध ब्योरों के तत्कालीन समाज के बारे में उपलब्ध साक्ष्यों और उस काल के आदि के आधार पर व्याख्या करता है।

कई बार ये ब्योरे बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए होते हैं तो कई बार ऐतिहासिक साक्ष्य भी तुड़े-मुड़े रूप में सामने आते हैं। फिर उन घटनाओं को देखने और समझने का नजरिया भी कभी एक सा नहीं होता। हर व्यक्ति की अलग व्याख्या होती है। यही कारण है कि दो इतिहासकारों की व्याख्याएँ प्रायः अलग-अलग होती हैं।

मसलन भारत को ही अगर लें तो इतिहासकारों का एक बड़ा तबका मानता है कि आर्य बाहर से आए थे, जबकि दूसरा तबका मानता रहा है कि आर्य भारत के ही मूल निवासी थे। ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता (मोहनजोदड़ों आदि) आर्यों से पहले की है, जो उन्नत थी मगर जिसमें न घोड़े थे, न लोहे से बने अस्त्र।

अपनी उन्नत युद्ध कला की बदौलत उन्होंने सिंधु घाटी जैसी सभ्यता को नष्ट कर डाला। तो दूसरे वर्ग के इतिहासकार कहते हैं कि भारत में सिंधु घाटी की सभ्यता से पहले के काल की ऐसी मुहरें मिली हैं, जिन पर पहिए के निशान हैं और यह भी पता चला है कि तब रथ होते थे जिनमें घोड़े जुतते थे।

भारत के लोगों ने इतिहास के बजाय हमेशा मिथकों से काम चलाया। यहाँ अपना इतिहास लिखकर छोड़ने की कोई परंपरा रही ही नहीं। इसलिए भारत के प्राचीन इतिहास को लेकर कोई एक राय नहीं रही। मगर इतिहास के दो अलग-अलग संस्करणों का पढ़ना भी उतना ही दिलचस्प होता है।
मध्य एशिया से आने वाले लोग बेशक घोड़े तो ला सकते थे, मगर वहाँ के भूगोल को देखते हुए वहाँ रथ का प्रयोग मुश्किल लगता है। इसके लिए तो गंगा यमुना का मैदानी इलाका चाहिए। इन दो व्याख्याओं से जाहिर है कि इतिहास लिखना मुश्किल काम है।

ऐसे ही हम लोग भारत में अकबर को एक महान सम्राट मानते हैं और स्थापत्य कला, साहित्य, खानपान, युद्ध कला और संगीत आदि में अपूर्व योगदान के लिए मुगलों की प्रशंसा करते हैं, जबकि पाकिस्तान में अकबर खलनायक और औरंगजेब नायक है।

भारत में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो मुगलों के शासन को भारतीय संस्कृति और धर्म के क्षय के रूप में देखते हैं। इसी तरह ब्रिटिश हुकूमत के भारत में योगदान को लेकर भी अलग-अलग मत हैं।

इतिहास नए-नए साक्ष्यों और व्याख्याओं के साथ विभिन्न नजरियों का अंतर कम करने का काम करता है, लेकिन राष्ट्रवाद, जो इतिहास की अपेक्षा एक नई अवधारणा है, इतिहास को हमेशा अपने पक्ष में मोड़ने का काम करता है। जैसे महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी का मुगलों से संघर्ष विदेशी बनाम राष्ट्रवादी में रूपांतरित हो गया।

भारत के लोगों ने इतिहास के बजाय हमेशा मिथकों से काम चलाया। यहाँ अपना इतिहास लिखकर छोड़ने की कोई परंपरा रही ही नहीं। इसलिए भारत के प्राचीन इतिहास को लेकर कोई एक राय नहीं रही। मगर इतिहास के दो अलग-अलग संस्करणों का पढ़ना भी उतना ही दिलचस्प होता है।

प्रसिद्ध इतिहासकार इरफान हबीब ने लिखा है कि इतिहास की उपयोगिता का अर्थ यह नहीं है कि आज जो रीति-रिवाज जो परंपराएँ चल रही हैं, उनका औचित्य सिद्ध करने के लिए जानबूझकर अतीत को खंगाला जाए। उसके लिए तो माइथोलॉजी या पौराणिक कथाएँ ही काफी होती हैं।

मसलन हमारे यहाँ बुद्ध की ऐतिहासिक जीवनी के बजाय उनके पिछले जन्मों की कथाएँ या जातक अधिक लोकप्रिय हुईं। इसलिए कह सकते हैं कि इतिहास की जरूरत उन्हें है, जो अतीत का ठीक-ठीक ब्योरा पढ़ना चाहते हैं और इस तरह अतीत की पुनर्रचना करना चाहते हैं।

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घटनाओं की सही संदर्भों में सही व्याख्या करना ही के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है। सच्चा इतिहास राजवंशों का इतिहास नहीं होता, बल्कि तत्कालीन समाजों का इतिहास होता है और इतिहासकार किसी राज्य, राजा, उसके युद्ध और हार-जीतों के ब्योरे ही नहीं बताते, उनके जरिए तब के सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक परिदृश्य और मनुष्य की दशा और दिशा को भी बताने का प्रयास करते हैं। आजकल इसी सबाल्टर्न हिस्ट्री की धारा जोड़ पकड़ रही है, जिसमें तत्कालीन समाज के आम आदमी के रहन-सहन, रीति-रिवाजों, मान्यताओं और संघर्षों के जरिए इतिहास की पुनर्रचना की जाती है।
इसकी जरूरत उन समाजों को होती है, जो इसके जरिए ऐसी सामूहिक चेतना का विकास करना चाहते हैं, जो छोटे-मोटे परिवर्तनों को अंगीकार करके मनुष्य जाति की उन्नति और विकास में सहायक बने। (नईदुनिया)



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