हास्य की बहार लेकर आए थे भगवान दादा

एक अगस्त को जन्म दिवस पर विशेष

नई दिल्ली (भाषा)| भाषा|
हिंदी सिनेमा के पहले डांसिंग स्टार भगवान दादा ने अभिनय एवं नृत्य की अनोखी शैली से कॉमेडी को नई परिभाषा दी और उनकी अदाओं ो बाद की कई पीढ़ियों के अभिनेताओं ने अपनाया

भगवान दादा ने मूक फिल्मों के दौर से अपने अभिनय जीवन की शुरुआत की थी, लेकिन उनके हास्य अभिनय और नृत्य शैली ने अपने दौर में जबरदस्त धूम मचाई। आज के दौर के महानायक अमिताभ बच्चन ने भी उनकी नृत्य शैली का अनुसरण किया।

भगवान दादा का जन्म 1 अगस्त 1913 को एक मिल श्रमिक के घर हुआ था। बचपन से ही उन्हें फिल्मों के प्रति आकर्षण था और पढ़ाई के प्रति उन्हें विशेष रुचि नहीं थी।
इस कारण उन्हें पिता के कोप का शिकार भी होना पड़ा, लेकिन धुन के पक्के दादा ने तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद हार नहीं मानी और हिंदी सिनेमा के रोमांटिक नायक की पारंपरिक छवि को नया आयाम मिला।

शुरू में उन्होंने अपने शरीर पर काफी ध्यान दिया और बदन कसरती बना लिया। इसका फायदा उन्हें आगे मिला। फिल्मों में प्रवेश के लिए उन्हें काफी मशक्कत करना पड़ी और अंतत: उन्हें 1930 में ब्रेक मिला, जब निर्माता सिराज अली हकीम ने अपनी मूक फिल्म बेवफा आशिक में एक कॉमेडियन की भूमिका दी। इसके बाद उन्होंने कई मूक फिल्मों में अभिनय किया।
इस दौरान भगवान दादा ने अपनी लगन से फिल्म निर्माण से जुड़ी अन्य विधाओं का भी अच्छा ज्ञान अर्जित कर लिया। 1934 में प्रदर्शित 'हिम्मत-ए-मर्दां' उनकी पहली बोलती फिल्म थी। 1938 से 1949 के बीच उन्होंने कम बजट वाली कई स्टंट फिल्मों एवं एक्शन फिल्मों का निर्देशन किया।

उन फिल्मों को समाज के कामकाजी वर्ग के बीच अच्छी लोकप्रियता मिली। उन फिल्मों में दोस्ती, जालान, क्रिमिनल, भेदी बंगला आदि प्रमुख हैं। भेदी बंगला सस्पेंस फिल्म थी।
इसे देखकर राजकपूर और भगवान के अजीज मित्र सी. रामचंद्र यानी चितलकर ने उन्हें सामाजिक फिल्म बनाने की सलाह दी। इसके बाद भगवान ने 1951 में 'अलबेला' बनाई जो जबरदस्त कामयाब रही। इसे समाज के हर वर्ग ने पसंद किया और कई सिनेमाघरों में यह 50 सप्‍ताहों से भी अधिक समय तक चली।

इस फिल्म का संगीत सी. रामचंद्र का था, जबकि गीत राजिन्दर कृष्ण और डायलॉग एहसान रिजवी ने लिखे थे। अलबेला का संगीत काफी कामयाब रहा और शोला जो भड़के, शाम ढले, भोली सूरत आदि गीत यादगार बन गए। इसके अलावा इस फिल्म के एक गीत धीरे से आजा री निंदिया अंखियन में को हिंदी फिल्मों की सर्वश्रेष्ठ लोरियों में से एक माना जाता है।
'अलबेला' की कामयाबी के बाद भगवान दादा ने गीताबाली के साथ ही दो और फिल्मों 'लाबेला' और 'झमेला' बनाई, लेकिन दोनों ही फिल्में बुरी तरह नाकाम रहीं। झमेला से उनकी जिंदगी की दूसरी पारी शुरू हुई जो कटु अनुभवों से भरी थी।

बाद के दिनों में उन्होंने कई फिल्मों में छोटी-मोटी भूमिकाएँ की, लेकिन हिंदी सिनेमा के बदलते रंग-ढंग उन्हें रास नहीं आए और वे इससे अलग हो गए।
करीब छह दशक लंबे अपने फिल्मी जीवन में भगवान दादा ने करीब 48 फिल्मों का निर्माण या निर्देशन किया, लेकिन बॉम्‍बे लैबोरेट्रीज में लगी आग के कारण अलबेला और भागमभाग छोड़कर सभी फिल्मों का निगेटिव जल गया और नई पीढ़ी बेहतरीन कृतियों से वंचित रह गई।

एक समय बंगला और कई कारों के मालिक भगवान अपनी मित्रमंडली से घिरे रहते थे, पर नाकामी के साथ ही धीरे-धीरे सब छूटने लगा। जीवन के अंतिम दिनों में उन्हें चाल में रहना पड़ा। अंतत:एकाकीपन झेल रहे भगवान दादा 4 फरवरी 2002 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।



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