'विकास के मॉडल में कहां है, भाषा...?'

-प्रभु जोशी

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यहां यह गौर करना दिलचस्प है कि सत्ता की कॉरपोरेट-राजनीति, जो अंग्रेजी में विकास की दर पर दहाड़ती थी, वह पूंछ दबाकर दृष्य से गायब है और विपक्ष हिन्दी में हिम्मत संभालकर अपने-अपने ढंग से लड़ रहा है। यह भाषा में भरोसे की वापसी है। अब दलों को अपने घोषणा पत्रों का नहीं, बल्कि सत्ता के लिए बिलबिलाती राजनीति के लिए अब भाषा का ही असली आसरा रह गया है।

जो भाषा की बक-बक में आगे होगा, वही विजेता होगा। अंग्रेजी में अभी तक जो लोग 'सेक्यूलरिज्म' की व्याख्‍या करते आ रहे थे, वे इस समय असहाय होकर हाथ मल रहे हैं और भारतीय जनता पार्टी का प्रस्तावित प्रधानमंत्री अपनी भाषा को संवारकर, हत्या को सम्मानजनक कर्मसिद्ध करता हुआ, भेड़ों को घेरकर बूचड़ खाने की दिशा में ले जाने में कामयाब होता दिख रहा है।

लेकिन इस सबके दरमियान गरेबान पकड़ने वाली निर्लज्ज सचाई यह है कि इन चुनावों के बाद कोई भी राजनीतिक-दल सत्ता में आए, उसके सामने यह साफ हो चुका है कि उसको 'सत्ता तक पहुंचाने वाली भाषा; हिन्दी ही है। यह सिंहासन तक सेतु बनाती है लेकिन अल्पावधि का ही, जिसे पिछले पैंसठ वर्षों से उपयोग के बाद अपने वर्गीय हितों के लिए तुरंत तोड़ दिया जाता रहा है। यही वजह है कि इस महादेश के जनतांत्रिक-पर्व के पूरे होते ही इसे यथास्थान रख दिया जाएगा, क्योंकि विकास के बहुप्रचारित किसी भी मॉडल से भाषा बहिष्कृत है। उसकी जगह हत्या करने के बाद छुपाकर दूर रख दी जाने वाली खुखरी की तरह है, जिस पर पहली बार एक नई धार पैदा की गई है, जिससे एक-दूसरे पर निर्मम और निर्लज्ज हमले किए गए।

राजनीति में यह 'थ्री-इडियट्‌स' की भाषा का स्वागत योग्य प्रवेश बन गया। रैंचों ने अपनी असली और अप्रकट-सी 'भैंचों' की छवि हासिल कर ली। कहना न होगा कि इस चुनाव में हर नेता ने देश और समाज को तो कम, परंतु खुद को अपशब्दों में अधिक आत्मनिर्भर बनाया। कुल मिलाकर, कॉर्पोरेटी-विज्ञापन, जो कहता है कि दिमाग की भाषा भारत में एक है, लेकिन दिल की भाषा हिन्दी है। दरअसल, पिछले एक-डेढ़ दशक से उसे भड़ास की भाषा बना दिया गया है।

हकीकतन तो वे 'दिल की भाषा' कहकर उसे बोल-चाल भर की काम-चलाऊ लध्दड़ भाषा कहना चाहते हैं, लेकिन ऐसा कह देने से हिन्दी बोलने वाले लम्पट लोग भड़क सकते हैं। इसलिए उसके आगे 'दिल की भाषा' जैसा विशेषण जोड़ दिया, जबकि उनका इस बात पर ध्यान नहीं गया कि हिन्दी वाले खुद ही उसे लम्पटों की भाषा ही बनाने में लगे हैं। दिमाग की अर्थात् 'सोचने की भाषा' वह नहीं है। वह लुच्चो-लफंगों की भाषा है। नमो-नमो का मंत्रोच्चार करती पीढ़ी की फेसबुक प्रतिक्रियाएं पढ़ो तो लगता है, दिमाग और बड़ी आंत के बीच म्युचुअल ट्रांसफर हो गया है। वहां निष्ठा की तुक विष्ठा से मिल रही है।

बहरहाल पूछा जाना चाहिए कि क्या इन दिनों चौतरफा प्रचारित विकास के मॉडल की हकीकत को ग्लोबलाइजेशन के द्वारा पैदा किए आदर्शवाद में धुत्त पीढ़ी जानती भी है कि नहीं? ग्रे-बेकर ने अल्प-उपभोगवादी भारतीय युवा के अचानक मार्केट-फ्रेण्डली-इण्डिविजुल में बदल जाने को लेकर एक शब्‍द ईजाद किया है, 'जॉयस जनरेशन'। आनंदवाद के अतिरेक में डूबी पीढ़ी। सेलिब्रेशन इज देअर अल्टीमेट गोल। इस अनियंत्रित आनंदवाद का कोई शिखर नहीं, सिर्फ वहां पठार है।

बहरहाल, विकास का मॉडल, जो इन दिनों प्रचार-प्रविधि से आसमान नाप रहा है, उसका आर्थिक-दृष्टि से मूल्यांकन करें तो वह केवल 'हैप्पी-इकोनोमिक्स' का विज्ञापनी रूप है। शाइनिंग-इंडिया भी इसी की उपज था, जिसमें शहरी-मध्यवर्ग को महानगरीय जीवशैली के लपकभरने का काम किया जाता है। वह वर्गांतरण के मिथ्याभास से भर उठता है। यह अलग बात है कि सेक्स-फ्रीडम हैप्पी-इकोनोमिक्स में सबसे आगे के पायदान पर है। हाल ही में हार्वर्डी-समझ वाले वित्तमंत्री ने कहा ही है कि भारत में अश्‍लील-वेबसाइट पर रोक लगाने से हमें भारी घाटा उठाना पड़ेगा। फेसबुकिया पीढ़ी का यह सबसे सरल और सस्ता आनंदवाद है।

मसलन नेहरू जब विकास की अवधारणा को लेकर आगे बढ़े तो उनके पास एक स्पष्ट अर्थनीति थी। वह 'महालनोविस मॉडल' था जिसमें विकास का एक मानचित्र था। लेकिन, यहां जो मॉडल है, इसमें समाज के भीतर मौजूद वर्ग-द्वन्द्व को मूलगामी-परिवर्तन की प्रक्रिया की तरफ ले जाने के लिए कोई आर्थिक-मानचित्र नहीं दिखाई देता। शिक्षा प्रणाली के बारे में उनकी अवधारणा वही है, जो अटल बिहारी वाजपेयी युग में बिड़ला और अंबानी द्वारा सुझाई गई थी। अलबत्ता ये भी भारत में शिक्षा की मल्टीनेशनल अर्थात्‌ हार्वर्ड-ऑक्सफर्ड लाएंगें, जो संपन्न वर्ग की संपन्नता में वृदि्ध ही करेगा और भारत में एक नए धनाढ्‌य वर्ग का निर्माण होगा। देशज शिक्षा-संस्थान उसके लिए सूअरबाड़ा होंगें।

यदि हम आज संसार के सर्वोत्कृष्ट शिक्षा संस्थानों की फेहरिस्त को देखें तो यह पाएंगे कि उसमें जितने भी विश्‍वविद्यालयों के नाम हैं, वे सभी अपने ही देश की भाषा में शिक्षा की व्यवस्था नीति लागू किए हुए हैं। पिछले ही दिनों दिल्‍ली के एक राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक में प्रथम पृष्ठ पर खबर छपी कि भारतीय 'बिजनेस-स्कूल' में चीन की मंदारिन भाषा की पढ़ाई शुरू की जा चुकी है। क्योंकि वह विश्‍व-व्यवसाय के भविष्य का विराटतम मुल्क होने जा रहा है। रिपोर्ट में मंदारिन सीखने वाले छात्रों का बढ़ता आंकड़ा भी बताया गया है।

प्रश्‍न उठता है कि हिन्दी विश्‍व की दूसरे नम्बर की सबसे बड़ी भाषा है, लेकिन उसे हमने व्यवसाय की भाषा नहीं बनने दिया और अब हम चीन की चित्रात्मक-लिपि वाली मंदारिन सीख रहे हैं, जिसमें कोई दो हजार चिन्ह हैं। याद रखिए कि जब अमेरिका ने अपने बिजनेस स्कूलों में भारत में व्यवसाय के लिए हिन्दी को जानना जरूरी बताते हुए फिलाडेल्फिया के प्रबंधन स्कूल ने पाठ्‌यक्रम बनाने की तैयारी की तो भारत के सत्ता के अभिजातों ने उन्हें कहा कि अब जबकि पूरा भारत अंग्रेजी की तरफ कूच कर रहा है, तब आप उसे फिर से क्यों विकास-विरोधी दिशा में धकेल रहे हैं?

जी हां, अब हिन्दी को नई पीढ़ी के लिए विकास विरोधी बता दिया गया है। यदि शिक्षा में हमने अपने यहां हिन्दी के लिए जगह बनाई होती तो हम पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, मारीशस, सूरीनाम आदि से भी हिन्दी में व्यवसाय करते तो वह अंग्रेजी से कहीं ज्यादा डॉलर कमाती। क्योंकि एक अरब के इस देश के व्यवसाय के लिए हवाई हमले का काम सिर्फ हिन्दी ही कर रही है। लेकिन थलसेना की तरह आगे बढ़कर अंग्रेजी सबकुछ पर कब्जा कर लेती है।

हकीकत यह है कि इस जॉयस जनरेशन को 'हैप्पी इकोनोमिक्स' ने बेलगाम बना दिया है। उन्होंने अपनी योजनाओं से नहीं, बल्कि भाषणों से ही उम्मीद के उन्माद से भर दिया है। 'अच्छे दिन आने वाले हैं' की कोई आर्थिकी स्पष्ट नहीं है। उसकी कोई वर्गीय-दृष्टि भी स्पष्ट नहीं है। बल्कि हकीकत ये है कि ये बहु-प्रचारित आनंदवाद उच्चवर्ग की 'उफनती संपन्नता' के छींटों के सहारे रहेगा। यह ट्रिकल डाउन वाली ही सिद्धांतिकी है, इसलिए अब भारत में लोक कल्याणकारी संवैधानिक सत्ता, नहीं अंबानी और अदानी ही 'अच्छे दिन लाएंगे'। जिसमें केवल सोलह प्रतिशत लोग अति-संपन्न होंगे। वहां ही सबसे ज्यादा रोशनी होगी।

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यह सर्वथा निर्विवाद सचाई है कि दुनिया के तमाम युद्ध, अस्त्रों-शस्त्रों से हारे या जीते नहीं जाते, बल्कि युद्धों में जय-पराजय के पलड़े का उठना या गिरना भाषा के सामर्थ्य से होता है। इसका प्रत्यक्ष चरितार्थ लोकतंत्र के महापर्व की तरह बताए जा रहे संसद के इन चुनावों में बहुत स्पष्टता के साथ दिखाई दिया, क्योंकि हर दल और हर एक नेता के लिए उसने लगभग युद्ध की शक्‍ल अख्तियार कर ली है।
बहरहाल ये बेलिहाज सचाई है कि उन आने वाले 'अच्छे दिनों' के पीछे अंधेरा ही होगा। हां, मुक्तिबोध का वह अंधेरा, जहां डोमाजी उस्ताद है। कुख्‍यात हत्यारा। राम के नाम को 'सत्य' कहने वाली उस अंधेरे में चलती उन्मादी भीड़ में सब चुप होंगे। क्योंकि सभा में वही सभापति होगा, और उद्योग में वही उद्योगपति। ये जॉयस जनरेशन उसी जुलूस का हिस्सा बनने जा रही है। पिछली सत्ता जो लगभग अपना बोरिया-बिस्तर बांधने की स्थिति में है, उसने भी तो यही किया था। जीडीपी और हैप्‍पी इकोनोमिक्स को एक-दूसरे से नाथ दिया था। आने वाला समय आनंदवाद से 'नाथ' कर, एक नई प्रविधि से हमको 'अनाथ' बनाकर रहेगा, ऐसे संकेत बहुत साफ ही दिख रहे हैं।

 

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