उन्हें अपने अंत का आभास था

नई दिल्ली (मणिशंकर अय्यर)| ND|
आज जब वे इस संसार में नहीं हैं और मैं कभी उनसे साक्षात्कार नहीं कर पाऊँगा, मुझे बार-बार उस घटना की याद आती है, जब 1986 में गाँधी जयंती के अवसर पर उनकी हत्या का प्रयत्न हुआ और मैं उनका असली चेहरा देख पाया। उन्हें और बातों के साथ-साथ विस्फोटक पदार्थों का पूरा ज्ञान था। यही कारण था कि जब उस दिन राजघाट पर गोली चली तो वे तुरंत जान गए थे कि क्या हुआ है।

उन्होंने धीरे से राष्ट्रपति ज्ञानी जैलसिंह के कान में कहा कि तनिक जल्दी चलिए और अपने-अपने परिवारों को वापस भेजकर फिर शांति वन की ओर जाएँगे। उस दिन जब मृत्यु उनसे कुछ ही फासले पर थी, उन्होंने अपना धैर्य बनाए रखा, दूसरों की सुरक्षा के लिए नपे-तुले अंदाज में आदेश दिए और डर की छाया को अपने पास फटकने तक नहीं दिया।

किसी को भी तनिक आभास तक नहीं हुआ कि वे भयभीत हो गए थे या चिंतित थे। उन्होंने उस दिन का सारा कार्यक्रम पूरा किया और इस बात का प्रयत्न किया कि सामान्य दिनों जैसी स्थिति बनी रहे। कुछ घंटे बाद हम विमान से नागपुर के लिए चले। उन्होंने मुझे अपने कक्ष में बुलाया और नागपुर पहुँचने तक हम दोनों साथ-साथ रहे और उस भाषण का मसौदा तैयार करते रहे जो उन्हें सेवाग्राम में देना था।
वे मुझसे अहिंसा की बात करने लगे और बोले कि सच्ची अहिंसा तो यह है कि आप उस व्यक्ति से, जिसने आप पर हाथ उठाया हो, बदला लेने की बात तो दूर, यह सोचें भी नहीं कि बदला लेना चाहिए। उनका कहना था कि हिंसा का सामना अहिंसा से करना ही सबसे बड़ी वीरता है। कहने लगे कि अपनी भूलों का प्रायश्चित करके ही आप अपने 'शत्रु' को इस बात के लिए प्रवृत्त कर सकते हैं कि वह अपनी भूल को स्वीकार करे।
उस दिन यह देखकर मेरी आँखें खुल गईं कि राजीव ने महात्मा गाँधी के अहिंसा के दर्शन को किस सीमा तक अपने मानस में समा लिया है। किसी व्यक्ति ने उनकी जान लेने की चेष्टा की और यह केवल संयोग था कि वह सफल नहीं हुआ, लेकिन उनके मन में उसके प्रति शत्रुता का कोई भाव नहीं था और न उनकी वाणी से ऐसी कोई बात प्रकट होती थी। इसका कारण केवल यह था कि उन्हें इस बात का दृढ़ विश्वास था कि हिंसा से किसी समस्या का समाधान संभव नहीं है।
उन्होंने मुझसे सुरक्षा के प्रबंध के बारे में भी बात की। बोले कि कितनी भी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था क्यों न हो, वह मुझे बचा नहीं पाएगी। आकाश की ओर इंगित करते हुए कहने लगे कि सुरक्षा तो ऊपर वाला देता है। जब अंत समय आ जाएगा तो उसे कोई रोक नहीं पाएगा तब तक ऊपर वाला मुझे बचाएगा। उसी दिन शाम को नागपुर के मुख्य मैदान में वे मंच पर बैठे थे जहाँ तेज प्रकाश था। सामने जनता की अपार भीड़ थी। वे वहाँ पर दक्षिण-मध्य क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र का उद्घाटन करने गए थे।
वहाँ पर बैठा कोई भी उन्हें अपना निशाना बना सकता था। मैं कम-से-कम इतना कर सकता था कि उनके पीछे खड़ा रहूँ। समारोह लगभग दो घंटे चला और वे क्षणभर के लिए भी चौंके या विचलित नहीं हुए। उनके चेहरे पर क्षणभर के लिए भी घबराहट का कोई चिह्न दिखाई नहीं दिया। लेकिन उनकी आँखें अंधेरे में छिपे हुए हत्यारों की खोज में अवश्य होंगी।

वे जानते थे-यह बात उनके मन और हृदय में बसी हुई थी-कि सैकड़ों ऐसे पागल नर-नारी हैं जो उनकी जान लेने के षड्यंत्र रचते रहते हैं। इसके बावजूद वे न घबराए, और न डरे, संयत स्वभाव से बैठे रहे। मैं 6 वर्ष तक उनके साथ रहा और यह देखता रहा कि वे मौत की छाया में चल रहे हैं। एक बार भी उन्होंने उस डर के कारण कोई ऐसा निर्णय करने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई जो उनके विचार से ठीक था। वे सबसे बहादुर व्यक्ति थे। मेरा वश चलता तो उनकी समाधि को धैर्य स्थल का नाम दिया जाता।
उनके मन में अपार दयाभाव भी था। मेरा एक मुख्य काम यह था कि जो लोग उनके पास सहायता के लिए आते थे, उन्हें प्रधानमंत्री राहत कोष और सरकारी साधनों से सहायता दी जाए। उन अभागों में पोलियो से पीड़ित बच्चे, विकलांग, युवक और युवतियाँ होते थे, जिनकी आँखों में चमक होती थी लेकिन जो शारीरिक विकारों से पीड़ित थे, किसी की टांग लंगड़ी थी, किसी की सूखी हुई बाँह हवा में लटकती थी और विकलांगता उनके लिए अभिशाप बनी हुई थी।
अंतिम बार मैं उन्हें 18 अप्रैल को अकॉर्ट के नवाब के घर पर मिला जहाँ ईद मिलन के अवसर पर नवाब ने भोज दिया था। मैं अकेला विमान से मद्रास पहुँचा था और नवाब से दोपहर के खाने पर मिला था। किसी ने इस बात की चर्चा राजीव से कर दी। खाने पर बैठे तो मेज पर बिरयानी का ढेर था, लगभग एक दर्जन प्रकार का मुर्गा और नाना प्रकार का बकरी का मांस। राजीव मेरी ओर मुड़े और कहने लगे, 'तो तुम दोपहर से खाते ही चले आ रहे हो !' मैं बोला नहीं, मुस्करा भर दिया।
भारतीय संघ मुस्लिम लीग के अब्दुल समद ने भोज के समय मुझे कहा कि मैं राजीव को इस बात के लिए तैयार करूँ कि भोज के तुरंत बाद मैरीना बीच पर होने वाली सभा में मुस्लिम लीग के बारे में भी कुछ कहें। जब राजीव मंच पर बैठे थे तभी मुझे उनसे बात करने का अवसर मिला। मैंने उनसे कहा, 'समद चाहते हैं कि आप मुस्लिम लीग की चर्चा करें। किसी भी प्रकार करें परंतु कर दें।' राजीव पूछने लगे, 'कैसे ?' मैंने उत्तर दिया, 'मुझे पता नहीं परंतु सौभाग्यवश मालिक आप हैं मैं नहीं।' इस पर वे अपने खास अंदाज में मुस्करा दिए। ये अंतिम शब्द थे जो मैंने उनसे कहे। उसके बाद सब खत्म हो गया।
उन्हें 22 मई को प्रातः 9 बजकर 20 मिनट पर मेरे चुनाव क्षेत्र में पहुँचना था। राजीव के जीवन के अंतिम दिन मैंने वोट माँगने का काम छोड़कर उन बातों की सूची बनाई जो मैं चाहता था कि वे अगले दिन मईलादुतिराई में अपने भाषण में कहें। मैंने फोन पर 10, जनपथ में राजीव के कार्यालय में पिल्ले को वे बातें बता दीं। उन्होंने मुझे बताया कि राजीव उस समय विशाखापट्टनम के रास्ते में हैं, जहाँ से वे सीधे विमान से मद्रास जाएँगे। तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राममूर्ति ने एक फैक्स नंबर दिया है।
मैं कल्पना करता हूँ कि राममूर्ति ने मीनमम हवाई अड्डे पर राजीव को वह फैक्स संदेश दे दिया होगा। अपनी कल्पना में मैं देख सकता हूँ कि राजीव ने उस संदेश पर एक दृष्टि डालकर उसे अपनी कमीज की जेब में रख लिया होगा। मैं यह भी देख सकता हूँ कि उत्साही भीड़ ने बिल्लीवम और पुरामाली में उनका स्वागत किया होगा, जब वे श्रीपेरम्बदूर में अपनी नियति से अंतिम भेंट करने जा रहे हैं। मैं उस स्त्री को भी देख सकता हूँ जो हार लिए उनके चरण छूने जा रही थी जैसे कि नाथूराम गोड़से ने महात्मा गाँधी के छुए थे।
मुझे कान फाड़ देने वाले उस विस्फोट की आवाज भी सुनाई देती है जिसने राजीव को अमरत्व प्रदान किया और साथ ही मेरे भाषण के भी हजारों टुकड़े कर डाले। अब विदा लेता हूँ आपसे श्रीमान्‌। ऊपर मिलेंगे। मैं यह कभी नहीं भूल पाऊँगा कि आप मेरे लिए क्या थे। अलविदा 'प्यारे राजकुमार'! (लेखक केंद्रीय मंत्री हैं)



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