ईमानदारी से करें पर्यावरण बचाने की शुरुआत

हम सबकी है पर्यावरण बचाने की जिम्मेदारी...!

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गांधीजी ने एक बार कहा था कि हमारे पास जरूरतें पूरी करने के लिए तो पर्याप्त साधन हैं पर लालच के लिए नाकाफी हैं। गांधीजी का यह कथन आज न सिर्फ ज्यादा प्रासंगिक है बल्कि हर मामले में सच साबित हो रहा है। पर्यावरण भी अपवाद नहीं है। अपनी बेहतरी की उम्मीदें करना और कुछ हद तक महत्वाकांक्षी होना स्वीकार्य हो सकता है लेकिन भौतिक सुख-सुविधाओं के बंदी बनकर संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करना सबके लिए बुरा है।

पर्यावरण बचाने की जिम्मेदारी हम सबकी है लिहाजा अपने-अपने स्तर पर कोशिशें करनी जरूरी हैं। इसकी ईमानदारी से शुरुआत चाहे तो राजनीतिक स्तर पर हो सकती है या फिर जनता के द्वारा भी पहल की जानी चाहिए। दरअसल, हालात तब बिगड़ते हैं जब हर किसी मामले में राजनीति होने लगती है।

पर्यावरण में आए असंतुलन का एक बड़ा कारण यह भी है कि सुविधाजनक जीवन की चाहत में हम संसाधनों को बिना सोचे-समझे बर्बाद करते जा रहे हैं। पानी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

एक गमले में लगे पौधे को बचाएं रखने के लिए एक-दो गिलास पानी पर्याप्त है, लेकिन हम डालेंगे एक बाल्टी! यह सोचे बगैर कि गमले में पानी तो दो ही गिलास गया बाकी सारा बर्बाद हो गया। लिहाजा जनता को अपना दायित्व समझने की जरूरत है। समझने की जरूरत यह है कि हम इस बर्बादी को कैसे रोकें? अपने व्यवहार और आदतों में परिवर्तन लाएं, जहां संभव हो सके।

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पानी को अन्य तरीकों से भी बचाया जाना चाहिए। जैसे - बरसात के पानी को बचाने की कोशिशें तेज होनी चाहिए। पर्यावरण में जो बदलाव आ रहे हैं यदि उनमें संतुलन लाना है तो सबको मिलकर काम करना होगा। जलवायु परिवर्तन को लेकर प्रधानमंत्री का अपना मिशन है और केंद्र तथा राज्य स्तर पर हालात संभालने की कोशिशें भी की जा रही हैं। हमें भूमि प्रबंधन और भूमि अधिग्रहण से जुड़े नियम कायदों में बदलाव लाना होगा।

यही नहीं, बड़े पैमाने पर खेती की पद्धति में बदलाव लाने की भी दरकार है। किसानों को चाहिए कि वे अधिक से अधिक ड्रिप सिस्टम का विकल्प अपनाएं। किसानों के साथ-साथ आम लोगों को भी यह समझने की जरूरत है कि पानी जितना है काम तो उसी से चलाना है।

देश और समाज के समग्र विकास की बात करें तो सबको जीवन और रहन-सहन के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है। यह ध्यान में रखना चाहिए कि हमें हर साल एक करोड़ नए रोजगार बनाने हैं।

अगर आज से चालीस साल बाद का आकलन करें तो हम पाएंगे कि आजादी के समय देश की जितनी आबादी थी 2050 में वह उससे बढ़कर पांच गुना हो जाएगी। इतनी बड़ी आबादी को जीवन-यापन से जुड़े संसाधनों की आपूर्ति कैसे होगी, योजनाएं यह ध्यान में रखकर तैयार करनी हैं। इतनी बड़ी आबादी को पालने-पोसने के लिए सामाजिक, आर्थिक और प्राकृतिक सुरक्षा का एक मजबूत ढांचा चाहिए होगा।

यह तभी संभव हो सकता है जब माफियाराज का खात्मा हो और सरकार, जनता, कॉरपोरेट जगत और समाज का हर वर्ग अपने-अपने हिसाब से ईमानदारी से देश की तस्वीर बदलने की कोशिश करें।

अगर कोशिशें ईमानदारी से होंगी तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मदद भी मिलेगी। हमें यह समझ लेना चाहिए कि विकास का वास्तविक अर्थ है सबकी तरक्की। हर वर्ग की तरक्की। जाहिर है, सबकी तरक्की प्रकृति पर प्रहार कर, उसकी अनदेखी करके हासिल नहीं की जा सकती।

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पर्यावरण दिवस : सब मिलकर कदम बढ़ाएं...!
- बीजी वर्गी (लेखक 'द इंडियन एक्सप्रेस' के पूर्व संपादक हैं)




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