हँसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है

Manna Dey
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हिंदी के ख्यात कवि कुमार अंबुज की कहानी 'एक दिन मन्ना डे' में एक व्यक्ति मन्ना डे के कार्यक्रम में उन्हें सुनता है और पेशाबघर में रोने लगता है। उसे महसूस होता है कि एक दिन मन्ना डे मर जाएँगे। वह मन्ना डे द्वारा फुलगेंदवा न मारो गीत सुनने के बाद कहता है कि -क्या तान थी, क्या उठान और इतनी गहरी साफ-सुथरी आवाज कि कभी रेडियो या टेप पर न सुनी थी। वह बाद में यह भी कहता है कि मैं शायद ज्यादा भावुक हूँ। मगर सच मानिए, जरूरत पड़ने पर मन्ना डे को मैं अपना खून, अपनी किडनी, अपना लिवर तक दे सकता हूँ। लेकिन मन्ना डे को यह बात मालूम होनी चाहिए ताकि वक्त-जरूरत आने पर वे किसी तरह का संकोच न करें। मुझे लगता है कि मैं मर जाऊँ, बल्कि हममें से बहुत लोग मर जाएँ और मन्ना डे बच जाएँ तो सब ठीक हो जाएगा।

ऐसा होता है और शायद सब के साथ होता। कई बार होता है कि किसी खास मनःस्थिति में, रात के गहराते अँधेरे में, दोपहर के किसी खाली एकांत में या कभी बारिश की धुन में हमें किसी गायक की आवाज की तरलता, उसकी दिल चीर देने वाली तान या विचलित कर देने वाली उठान कुछ अजब-गजब असर करती है कि मन के किसी कोने में सोया दुःख एक बेचैन करवट लेकर आँसू में बदल जाता है।

और कभी-कभी कोई विरल आवाज हमारी आत्मा पर ओस की बूँदों की तरह चुपचाप गिरती रहती है और हम पाते हैं कि बरसों तक अपने में उधड़े जख्मों को ठंडी राहत मिल रही है। और कई बार ऐसा होता है कि कोई सुर आपकी अँगुली पकड़कर आपको एक बियाबान में छोड़ आता है जहाँ आप अपने को ही ढूँढ़ने की कोशिश करते हैं।

मन्ना डे की आवाज कुछ इसी तरह का असर करती है। कुछ गीत फिल्म के अंदर ही असर करते हैं और वे तभी तक जिंदा रहते हैं जब तक वे गाए जा रहे हैं। कुछ गीत हमेशा ही फिल्म के बाहर भी जिंदा रहते हैं। इस तरह के गीत फिल्म से बाहर निकलकर आपके जीवन का हिस्सा हो जाते हैं। और आप किसी उदास शाम में गाने लगते हैं -जिंदगी कैसी है पहेली हाय, कभी तो हँसाए कभी ये रुलाए। ‘आनंद’ फिल्म का ये गीत फिल्म में तो मानीखेज है ही क्योंकि यह फिल्म के पात्र, उसकी मनःस्थिति और उससे भी आगे जाकर जीवन के दर्शन का गान बनता है लेकिन फिल्म से बाहर निकलकर भी यह गीत आपको आपकी उदासी में इस तरह थाम लेता है कि लगता है कि आप अकेले नहीं हैं। कोई है जो आपका हाथ थामकर आपको जीवन का मर्म सिखा रहा है। एक जीवन को बहुत असहनीय हो गया है, उसे यह सहने करने के काबिल बनाता है। कुछ हिम्मत, कुछ ताकत देता है। लेकिन यह संभव होता है उस गायक की आवाज से। उसके गाने की शैली से। उसके गले की हरकत से। हालाँकि उसमें उसका गला ही शामिल नहीं होता बल्कि गले में आ बैठा उसका दिल गाता है। इस गाने में उसकी आत्मा शामिल होती है। मन्ना डे अपनी आवाज की किसी तान या उठान से, अपनी आवाज की किसी गूँज से उसमें अर्थ को खोल देते हैं। उनका यही कमाल है।

कुमार अंबुज की इसी कहानी का नैरेटर जब अपने घर जाकर आलमारी से मन्ना डे की कैसेट अपने टू इन वन में सुनता है। एक गीत गूँजता है जिसके बोल हैं-हँसने की चाह ने कितना मुझे रुलाया है। मन्ना डे की आवाज गूँज रही है और यह गीत सुनकर नैरेटर भी रोने लगता है। और महसूस करने की लगता है कि -मुझे रह रहकर वह आदमी याद आने लगा और उसका खयाल कि एक दिन मन्ना डे...। मैंने उस रात में पहली बार उस खयाल की मारक बेचैनी को महसूस किया।

गीत आपके जीवन में यह कर सकते हैं। वे आपमें दूसरों के दुःख और बेचैनी को, दूसरों के मारक खयालों को, दूसरों से सपनों आशा और आकांक्षाओं को समझने-महसूस करने की संवेदनशीलता पैदा करते हैं। और शायद इससे भी आगे जाकर वे आपके खुद के दुःखों-संतापों को , खुशी और उमंग को, सपनों और उसकी टूटन को समझने की तमीज पैदा करते हैं। इसी तरह गीतों के जरिये और उन गीतों को गाने वाले विरल गायकों-गायिकाओं के जरिये हम जीवन के मर्म को जानते-बूझते हैं।

रवींद्र व्यास|
मन्ना डे ऐसे ही गायक हैं। वे हमें बताते हैं कि हँसने की चाह ने हमें कितना रुलाया है। और यह भी कि इसी रोने के बाद हँसने की चाह पैदा होती है। यही गीत है, यही जीवन संगीत है।



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