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श्री धन्वंतरि चालीसा

Written By WD Feature Desk
Updated: शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2024 (12:25 IST)
श्री धन्वंतरी चालीसा | dhanvantari chalisa
 
।श्री गणेशाय नमः।
 ॥ दोहा ॥
करूं वंदना गुरू चरण रज, ह्रदय राखी श्री राम।
मातृ पितृ चरण नमन करूं, प्रभु कीर्ति करूँ बखान 
तव कीर्ति आदि अनंत है , विष्णुअवतार भिषक महान।
हृदय में आकर विराजिए, जय धन्वंतरि भगवान ॥ 
 
॥  चौपाई ॥ 
जय धनवंतरि जय रोगारी। सुनलो प्रभु तुम अरज हमारी ॥
तुम्हारी महिमा सब जन गावें। सकल साधुजन हिय हरषावे॥
शाश्वत है आयुर्वेद विज्ञाना। तुम्हरी कृपा से सब जग जाना ॥
कथा अनोखी सुनी प्रकाशा। वेदों में ज्यूँ लिखी ऋषि व्यासा ॥
कुपित भयऊ तब ऋषि दुर्वासा। दीन्हा सब देवन को श्रापा ॥
श्री हीन भये सब तबहि। दर दर भटके हुए दरिद्र हि ॥
सकल मिलत गए ब्रह्मा लोका। ब्रह्म विलोकत भये हुँ अशोका ॥
परम पिता ने युक्ति विचारी। सकल समीप गए त्रिपुरारी ॥ 
उमापति संग सकल पधारे। रमा पति के चरण पखारे ॥
आपकी माया आप ही जाने। सकल बद्धकर खड़े पयाने ॥
इक उपाय है आप हि बोले। सकल औषध सिंधु में घोंले ॥
क्षीर सिंधु में औषध डारी। तनिक हंसे प्रभु लीला धारी ॥
मंदराचल की मथानी बनाई। दानवो से अगुवाई कराई ॥
देव जनो को पीछे लगाया। तल पृष्ठ को स्वयं हाथ लगाया ॥
मंथन हुआ भयंकर भारी। तब जन्मे प्रभु लीलाधारी ॥
अंश अवतार तब आप ही लीन्हा। धनवंतरि तेहि नामहि दीन्हा ॥
सौम्य चतुर्भुज रूप बनाया। स्तवन सब देवों ने गाया ॥
अमृत कलश लिए एक भुजा। आयुर्वेद औषध कर दूजा ॥
जन्म कथा है बड़ी निराली। सिंधु में उपजे घृत ज्यों मथानी ॥
सकल देवन को दीन्ही कान्ति। अमर वैभव से मिटी अशांति ॥
कल्पवृक्ष के आप है सहोदर। जीव जंतु के आप है सहचर ॥
तुम्हरी कृपा से आरोग्य पावा। सुदृढ़ वपु अरु ज्ञान बढ़ावा ॥
देव भिषक अश्विनी कुमारा। स्तुति करत सब भिषक परिवारा ॥ 
धर्म अर्थ काम अरु मोक्षा। आरोग्य है सर्वोत्तम शिक्षा ॥
तुम्हरी कृपा से धन्व राजा। बना तपस्वी नर भू राजा ॥
तनय बन धन्व घर आये। अब्ज रूप धनवंतरि कहलाये ॥
सकल ज्ञान कौशिक ऋषि पाये। कौशिक पौत्र सुश्रुत कहलाये ॥
आठ अंग में किया विभाजन। विविध रूप में गावें सज्जन ॥
अथर्व वेद से विग्रह कीन्हा। आयुर्वेद नाम तेहि दीन्हा ॥
काय ,बाल, ग्रह, उर्ध्वांग चिकित्सा। शल्य, जरा, दृष्ट्र, वाजी सा ॥
माधव निदान, चरक चिकित्सा। कश्यप बाल , शल्य सुश्रुता ॥
जय अष्टांग जय चरक संहिता। जय माधव जय सुश्रुत संहिता ॥
आप है सब रोगों के शत्रु। उदर नेत्र मष्तिक अरु जत्रु ॥
सकल औषध में है व्यापी। भिषक मित्र आतुर के साथी ॥
विश्वामित्र ब्रह्म ऋषि ज्ञान। सकल औषध ज्ञान बखानि ॥
भारद्वाज ऋषि ने भी गाया। सकल ज्ञान शिष्यों को सुनाया ॥
काय चिकित्सा बनी एक शाखा। जग में फहरी शल्य पताका ॥
कौशिक कुल में जन्मा दासा। भिषकवर नाम वेद प्रकाशा ॥
धन्वंतरि का लिखा चालीसा। नित्य गावे होवे वाजी सा ॥
जो कोई इसको नित्य ध्यावे। बल वैभव सम्पन्न तन पावें ॥ 
 
॥ दोहा ॥ 
रोग शोक सन्ताप हरण, अमृत कलश लिए हाथ।
जरा व्याधि मद लोभ मोह, हरण करो भिषक नाथ ॥ 
 
॥ इति धन्वंतरि चालीसा सम्पूर्ण ॥

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