आजादी का अमृत महोत्सव : रिवर्स माइग्रेशन का शुभ मुहूर्त


कल: गांव-कस्बों से आबादी का पलायन हुआ
आज: गांव वीरान हो गए, शहर अराजकता के अड्‌डे बन गए
कल: आजादी का अमृतकाल ‘रिवर्स माइग्रेशन’ का यह सही समय है…
1948 का साल था, जब छह साल की उम्र में मेरे पिता एक छोटे से गांव से निकलकर पास के एक ऐसे कस्बे में आए, जहां से रेलें गुजरती थीं, एक अनाजमंडी और छोटा सा बाजार था। वह आसपास के गांवों के लिए उम्मीदों से भरा हुआ उजाड़ सा कस्बा था। एक ऐसे मुल्क की दूर-देहात बदकिस्मत बस्ती, जो एक हजार साल की गुलामी से निकलकर बाहर आया था।

हमारे पुरखों ने 40 पीढ़ियों तक बेड़ियों में वंश चलाए थे और 15 अगस्त 1947 को एक लंबे संघर्ष और लाखों लोगों के बलिदान के बाद हमने अपने लोगों को दिल्ली में शपथ लेते हुए देखा। आजादी किसी खुशहाल रास्ते से नहीं आई थी। बटवारे में लाखों लोग मारे जा रहे थे और करोड़ों बेदखल हो रहे थे। वह विभाजन की रक्तरंजित विभीषिका थी, जिसे कभी भुलाया नहीं जाना चाहिए।

वह घोर गरीबी, अशिक्षा और पिछड़ेपन से निकला हुआ तीस करोड़ आबादी वाला एक लाचार और बीमार मुल्क था। अधिकतर आबादी दूर-देहातों में थी, जहां कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं था। वह बस जिंदा रहने लायक कमा-खा रही थी। औसत उम्र बहुत कम थी। बीमारियों के प्रकोप ज्यादा था। इलाज के साधन नहीं थे। उद्योग नहीं थे। शिक्षा संस्थान न के बराबर थे। भारत अपनी पुरानी ज्ञान परंपरा को जैसे-तैसे बचाए रख पाया था, लेकिन आधुनिक युग में एक आजाद मुल्क की तरह उसे दुनिया में शक्तिसंपन्न दिखना भी था। यह सांप्रदायिक रूप से एक घुन लगा हुआ समाज था, जिसमें जातीय जहर का घालमेल जानलेवा था।

छह साल की उम्र में मेरे पिता गांव से कस्बे में आए थे और चारेक साल में ही मेरे दादा चल बसे। अब वह मेरी अनपढ़ दादी के साथ अकेले रह गए। गांव में थोड़ी बहुत जमीन पीछे छूट गई थी। दादी अच्छे दिनों की उम्मीद में कस्बे में ही रही। पिता को प्राइमरी स्कूल में ही समझ में आया गया कि पढ़ाई मुमकिन नहीं है। किशोर उम्र के पहले ही वे काम पर लग गए। ईश्वर ने उन्हें अथक परिश्रम और असीम धैर्य के साथ खुश रहने का गुण दिया था।

75 साल पहले शुरू हुई यह घर-घर एक ऐसी कहानी है, जिसमें पिता भारत के ही प्रतिरूप हैं। एक तरफ भारत अपनी नई यात्रा शुरू कर रहा था। उसी भारत में मेरे पिता जैसे करोड़ों लोग अपनी बेबसी से उबरने की जद्दोजहद में लग गए थे। छोटे-मोटे काम करते हुए आखिरकार वे एक रहमदिल सेठ की किराने की फर्म संभालने लगे। वे अपनी ईमानदारी और मेहनत से सेठजी का भरोसा जीतने में सफल हो गए।

एक दिन कहीं दूर दूसरे गांव के इज्जतदार ब्राह्मण पता ढूंढते हुए सेठजी के पास आए और अपनी बिन मां की बेटी के लिए एक लड़के के रूप में मेरे बीस वर्षीय पिता के बारे में पूछताछ की। इंसान की पहचान का हुनर हर किसी को नहीं आता। वह आंख ही दूसरी होती है, जो दूर का देख पाती है। सेठजी की इस गारंटी पर वह रिश्ता पक्का हो गया था कि इस लड़के के साथ आपकी बेटी कभी दुखी नहीं रहेगी और यह लड़का हमेशा यहीं नहीं रहेगा। वह बहुत तरक्की करेगा। बेफिक्र रहिए।

सत्तर का दशक आते-आते भारत अपनी आजादी की सिल्वर जुबली की तैयारी में लग गया था। पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपनी सामर्थ्य और अपनी समझ से इस देश को मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर की पटरी पर लाने की कामयाब कोशिश कर चुके थे। परिवारवादी राजनीति जड़ जमा चुकी थी। उनकी सुपुत्री इंदिरा गांधी ने अपनी काबिलियत दिखाने का मौका पार्टी से झपट लिया था। बटवारे का दंश कोई भूला नहीं था। पाकिस्तान टूटने की कगार पर आ चुका था। भारत अपने मजबूत पैरों पर हिसाब बराबर करने के लिए संभलकर खड़ा था।

मेरे पिता ने बीस साल की कड़ी मेहनत के बाद सत्तर के दशक की शुरुआत में अपनी पहली दुकान खोली। मेहनत में कभी कमी नहीं की थी। आलस्य उन्हें छूकर नहीं गुजरा था। हालातों के आगे हार मानना उनके खून में नहीं था। हमने अपने ही एक बड़े घर में आंखें खोलीं। दुकान में अब अपने जैसे कई मेहनतकश युवाओं के एक समूह को काम देने लायक वे हो गए थे। आजादी की रजत जयंती पर उनकी दूसरी पीढ़ी में हम तीन भाई बहन थे। हम उसी कस्बे में पैदा हुए थे।

हमने गांव के जीवन से पलायन के कठिन किस्से दादी और पिता से सुने। उनके कठिन संघर्ष की रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानियां थीं। परिश्रमी और सफल पिता पर मेरा गर्व अपनी उम्र के साथ बढ़ता ही गया। किंतु उनकी सफलता केवल परिश्रम का परिणाम नहीं थी। कुशल गृहिणी मेरी मां के उचित प्रबंधन, सही समय पर सही परामर्श और जरूरी फैसलों में उनकी भूमिका ने नब्बे के दशक में एक और शानदार मकान, दुकानें और गांव में सौ बीघा सिंचित जमीन का मालिक बना दिया।

अपने बूते एक-एक सीढ़ी आगे बढ़े मेरे माता-पिता हर मां-बाप की तरह चाहते थे कि जो कष्ट उन्होंने सहे, वह उनकी संतानों के हिस्से में न आएं। मेरी पढ़ाई गांव के सरकारी स्कूल से शुरू हुई। शहर के कॉलेज और फिर बड़े शहर के विश्वविद्यालय तक चली। मुझे 11 साल की उम्र में कस्बे से बाहर पढ़ने के लिए भेजने का कठोर निर्णय मां ने लिया, जो मेरे जीवन में मील का पत्थर सिद्ध हुआ।

1997 में जब देश ने आजादी की स्वर्ण जंयती मनाई तब पढ़ाई पूरी करने के बाद एक बड़े अखबार में रिपोर्टिंग आए हुए मुझे चार साल हो चुके थे। आजादी के समय की पहली पीढ़ी गांव से एक कस्बे में आई थी और अब दूसरी पीढ़ी कस्बे से शहर का रुख कर चुकी थी। मेरे पिता बच्चों की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर एक दिन कस्बा छोड़कर हमेशा के लिए गांव लौट गए। ये वही गांव था, जहां से वे छह साल की उम्र में निकले थे। वे कामयाब होकर लौटे थे। बिन बाप के अल्पशिक्षित बेटे ने अपनी मेहनत के बूते पर अपने बेटों को एक मजबूत आधार दिया था और गांव में भी वे अपने ही बूते हासिल सौ बीघा सिंचित जमीन के मालिक बनकर वापस आए।

मीडिया की नौकरी में आकर मैं तटस्थ भाव से देश में आ रहे बदलावों को देख और अनुभव कर रहा था। खासकर 1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण के बाद के दौर में। मेरी तरह लाखों युवा थे, जो छोटे शहरों और कस्बों से अपनी नियति की तलाश में बड़े शहरों का रुख कर रहे थे। ठीक उसी तरह जैसे पिता एक दिन अपने गांव से निकले थे। फर्क यह था कि हम पढ़-लिखकर काम की तलाश में थे। यही काम मेरे पिता ने बिना पढ़े, कस्बे में किया था। मेरा बेटा अब और बड़े शहरों का रुख कर रहा है। यह एक ही परिवार की तीसरी पीढ़ी है।

यह भारत के आम परिवारों की एक प्रतिनिधि कहानी है। गांव से कस्बों, कस्बों से छोटे शहरों और छोटे शहरों से बड़े शहरों के बीच भारत के एकतरफा पलायन की यह दर्दनाक कहानी है। इन 75 सालों में पलायन हर दशक में तेज होता गया है। गांवों की उपेक्षा देश पर भारी पड़ी है। हमारे शहर अराजकता और अव्यवस्था के अड्‌डे बन चुके हैं। वे अपनी क्षमता से ज्यादा आबादी ढो रहे हैं। राजनीतिक और प्रशासनिक अदूरदर्शिता के कारण यह समस्या लगातार गहराई है।

प्रश्न यह है कि आजादी के अमृतकाल में हम गंभीर विषय में क्या कर सकते हैं?

कोई सैद्धांतिक उत्तर देने की बजाए मैं व्यवहारिक बात करूंगा। एक प्रयोग मैंने चार साल पहले तब शुरू किया, जब मैंने अपनी उम्र के 50 साल पूरे किए। मैंने अपने कॅरियर के 25 साल मीडिया की नौकरियों और किताबों को लिखने में लगाए थे। मेरी अगली पीढ़ी बड़े शहरों में ही पढ़-लिखकर अपनी जीवन यात्रा आरंभ कर रही है। अब मुझे लगता है कि शहर में अब मेरी भूमिका समाप्त होनी चाहिए। 25 साल पहले वह एक मजबूरी थी कि डिग्री के आधार पर गांव या कस्बे में कोई अनुकूल काम नहीं था। मजबूरी में शहर में डेरे लगे। यहां परिवार बना। बढ़ा। अब बच्चों का लांच पैड शहर हैं। वे यहीं से अपनी दिशा तय करेंगे। हमारी उम्र के बचे हुए साल का समय प्रबंधन हमें पीछे लौटकर ही करना चाहिए।

यह सच है और यही होता आया है कि समय रहते ऐसा न किया तो एक दिन वे खेत बिक जाएंगे, जिनमें मेरे पिता और मेरी मां ने अपने जीवन के सपने बोए थे। क्या मुझे सिर्फ अपनी आरामतलबी के लिए शहरों में बेकार पड़े रहना चाहिए?

मैंने अपना एक ‘रिवर्स गियर’ लगाया है। मीडिया में रहकर कमाए हुए अपने अनुभवों, अपने रिश्तों और थोड़ी बहुत पूंजी के साथ मैंने रिवर्स माइग्रेशन के विचार पर कुछ जमीनी काम शुरू किया है। अगर मैं गांव के दस लोगों के हाथों में साल भर काम देकर उन्हें पलायन से रोक पाता हूं और उनके बच्चों की पढ़ाई लिखाई में कुछ हाथ बंटा सकता हूं तो मुझे ऐसा करना ही चाहिए। एक नागरिक के सीमित दायरे में मेरे लिए यह संतोषप्रद है।

हर राज्य में पिछले तीस सालों में शहरों का फैलाव कई आधुनिक कवर्ड कॉलोनियों, मल्टी स्टोरी कॉम्पलैक्स और मॉल-मार्केट के रूप में चारों तरफ दिखाई दिया है। ऐसे हर रहवासी क्षेत्र में साठ पार के रिटायर्ड लोग हजारों की तादाद में हैं, जिनके बच्चे बेंगलुरू, हैदराबाद, मुंबई, दिल्ली, गुरुग्राम या सिडनी, न्यूयार्क या लंदन तक जा पहुंचे हैं। वृद्धावस्था में ये लोग नौकरियों से सेवानिवृत्त होने के बाद दवाओं के सहारे एकाकी जीवन जी रहे हैं। ज्यादातर उन बेफिक्र बच्चों को कोसते हुए मिलेंगे, जो सालों तक उनकी सुध नहीं लेते। ठीक 25 साल पहले यही लोग अपने बच्चों के बड़े शहरों में ऊंचे पैकेज की नौकरियों पर अकड़ते हुए घूम रहे थे।

मैं मानता हूं कि इनमें से ज्यादातर किसी न किसी गांव या कस्बे या छोटे शहरों से निकलकर आए थे और अब शहरों में अटके हुए रह गए। इनका यहां कोई काम नहीं है। यह भीड़ कम होनी चाहिए। वे पढ़े-लिखे हैं। निजी या सरकारी नौकरियों में तीन-चार दशक का शानदार अनुभव उनके पास है। जाहिर है कि थोड़ा-बहुत धन और ऊंचे संपर्क भी होंगे। जरूरत है कि वे इस संचित पूंजी को अब गांवों में लगाएं। वहां इनकी सबसे ज्यादा जरूरत है। किसी गांव-कस्बे में तीस साल बाद चार ऐसे लोग लौट आएंगे तो हवा बदलना शुरू हो जाएगी। वे किसी स्कूल में दो घंटा पढ़ा सकते हैं। वे कुछ नए प्रयोगों की शुरुआत कर सकते हैं। मैं महसूस करता हूं कि इन सात दशकों में वीरान होते गए गांव उनकी तरफ टकटकी लगाकर देख रहे हैं। रालेगण सिद्धि में अण्णा हजारे और हिवरे बाजार में पोपटराव पवार ने यह कर दिखाया है। ये दर्शनीय और उन्नत गांव महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के हैं।

यह आजादी का अमृतकाल है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आवाज में असर है। उन्हें लाल किले से यह आव्हान करना चाहिए कि अब ‘रिवर्स माइग्रेशन’ का समय आ गया है। शहर में बसा हरेक व्यक्ति अपने गांव की तरफ पलटकर देखे, कुछ काम हाथ में ले, कुछ समय देना शुरू करे। भारत स्वच्छता अभियान जैसे प्रभावशाली अभियान में यह आव्हान बदलना चाहिए। 25 साल बाद जब भारत अपनी आजादी के सौ साल का जलसा मना रहा होगा, तब तक गांव-कस्बों की रौनक लौटकर आ जाएगी और शहरों का अनावश्यक भीड़-भड़क्का कम हो जाए! सरकारें देखें कि वे नीतियों में इस अभियान को कैसे गतिशील कर सकती हैं। यह नौकरशाही की काबिलियत का भी इम्तहान है।

इजरायल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेनगुरियन प्रधानमंत्री के रूप में अपनी भूमिका समाप्त होने के बाद तेल अवीव से रेगिस्तानी इलाके के अपने गांव के साधारण से घर में रहने चले गए थे और खेतीबाड़ी देखने लगे थे। आज वह घर उस महान मुल्क का एक ऐसा तीर्थ है, जहां दुनिया भर के लाखों लोग आते हैं। मुझे भी उस घर में जाने का मौका मिला। वह एक उदाहरण भारत की राजधानियों में पीढ़ियों के लिए कब्जा जमाने वाले विधायकों, सांसदों, मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के लिए भी एक सबक है कि अपने हिस्से की भूमिका पूरी होने पर वे अपने गांवों में ही जाकर रहें, आजीवन केवल भाषणों में भारत का कल्याण न करते रहें!
(लेखक ने पांच साल तक भारत के दूरदराज इलाकों की लगातार आठ परिक्रमाएं की हैं। नौ किताबें छपी हैं। कई पुरस्कार मिले हैं। मध्यप्रदेश में राज्य सूचना आयुक्त और प्रतिष्ठित बहुकला केंद्र भारत भवन के न्यासी हैं। इन दिनों गांवों में सक्रिय हैं।)



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