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मृगी मुद्रा योग का लाभ

Updated: बुधवार, 13 मई 2026 (18:59 IST)
मृगी मुद्रा। मृग हिरन को कहा जाता है। यज्ञ के दौरान होम की जाने वाली सामग्री को इसी मुद्रा में होम किया जाता है। प्राणायाम किए जाने के दौरान भी इस मुद्रा का उपयोग होता है। ध्यान करते वक्त भी इस मुद्रा का इस्तेमाल किया जाता है। यह मुद्रा बनाते वक्त हाथ की आकृति मृग के सिर के समान हो जाती है इसीलिए इसे मृगी मुद्रा (Mrigi mudra yoga) कहा जाता है। यह एक हस्त मुद्रा है।
 
मुद्रा बनाने की विधि : अपने हाथ की अनामिका और मध्यमा अंगुली को अंगूठे के आगे के भाग को छुआ कर बाकी बची तर्जनी और कनिष्ठा अंगुली को सीधा तान देने से मृगी मुद्रा बन जाती है।
 
योग आसन - इस दौरान उत्कटासन, सुखासन और उपासना के समय इस्तेमाल होने वाले आसन किए जा सकते हैं।
 
अवधि/दोहराव- इस मुद्रा को सुविधानुसार कुछ देर तक कर सकते हैं और इसे तीन से चार बार किया जा सकता है।
 
मृगी मुद्रा का लाभ ( mrigi mudra benefits ): मृगी मुद्रा करते समय अंगूठे के पोर और अंगुलियों के जोड़ पर दबाव पड़ता है। उक्त दबाव के कारण सिरदर्द और दिमागी परेशानी में लाभ मिलता है। एक्युप्रेशर चिकित्सा के अनुसार उक्त अंगुलियों के अंदर दांत और सायनस के बिंदु होते हैं जिसके कारण हमें दांत और सहनस रोग में भी लाभ मिलता है।
 
विशेष- माना जाता है कि इस मुद्रा को करने से सोचने और समझने की शक्ति का विकास भी होता है। मृगी मुद्रा मिर्गी के रोगियों के लिए बहुत ही लाभकारी है।
लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें

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