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स्वयं का गुरु बनाए योग
विज्ञान और धर्म हमें भ्रमित कर सकता है। सारे भ्रम और द्वंद्व की निष्पत्ति हो जाना ही शुद्ध ज्ञान की शुरुआत मानी जाती है। धर्म और विज्ञान के बीच का रास्ता है योग। योग ना तो विश्वास की बात करता है और ना ही संदेह की। योग पूर्णत: व्यावहारिक और प्रायोगिक विज्ञान है। दो दुनी चार जैसा। चमत्कार से परे।धर्म के बहुत से विश्वासों को विज्ञान ने ध्वस्त कर दिया है। इसी डर के चलते सभी धर्म के तथाकथित बुद्धिजीवी लोग अपने धर्म की बातों को तार्किक रूप से विज्ञानसम्मत बनाने में लगे हैं।निश्चित ही धर्म अफीम का नशा नहीं है, लेकिन फिर लोग इसके पीछे पागल क्यों है? लोग दूसरे धर्म के लोगों से नफरत क्यों करते हैं? क्या सत्य वही है तो धर्म ग्रंथों में लिखा है?विज्ञान स्वयं को अपडेट करता रहता है, जबकि धर्म नहीं। विज्ञान से हममे आस्था और सकारात्मकता नहीं जगाई जा सकती और विज्ञान के माध्यम से हम शुद्ध ज्ञान को प्राप्त भी नहीं कर सकते। विज्ञान या धर्म कुछ हद तक हमें शारीरिक या मानसिक स्वास्थ दे सकते हैं, लेकिन इनके स्थाई होने की कोई गारंटी नहीं।चित्तवृत्तियाँ :योग कहता है कि हम अपने ज्ञान या अनुभव की अपेक्षा चित्त पर जमे संस्कार और रुढ़ियों पर ज्यादा विश्वास करते हैं और उन्हीं के अनुसार चलते भी हैं अर्थात मृत्युपर्यंत तक हम अपने बुद्धि, बल या अनुभव की नहीं सुनते बल्कि संस्कारग्रस्त चित्त की ही सुनते हैं। बचपन में किसी बात को लेकर कोई डर या विश्वास मन में बैठ गया है तो हम उसे अंत तक मानते हैं या फिर माता-पिता या जातिगत संस्कारों से हटकर हम कभी कुछ नहीं सोंच पाते।कहते हैं कि वैज्ञानिक या कम्युनिस्ट जिंदगी भर यह तय नहीं कर पाते हैं कि कि ईश्वर है या नहीं है। धार्मिक या कट्टरपंथी लोग आँख मूँदकर विश्वास कर लेते हैं कि जो धर्मग्रंथ में जो लिखा है वही सत्य है और हमारा सत्य ही एकमात्र सत्य है बाकी का तो कचरा है, मनमाना है, अव्यवस्थित है या फिर जाहिल लोगों का सत्य।योग की आँखें :यम, नियम, आसन और फिर प्राणायाम के माध्यम से चित्तवृत्तियों का निरोध होता है। हम खाली स्लेट की तरह हो जाते हैं। यह उसी तरह है कि नदी में आए तूफान का शांत हो जाना, फिर उसका तल स्पष्ट दिखाई देगा। दूध का दूध और पानी का पानी। किसी भी बात को मानना, सोचना या उसमें शामिल होने से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है देखना और उसका विश्लेषण करना।साक्षी भाव आपको विजन देता है जिससे सत्य स्वयं ही आपके सामने प्रकट होने लगता है। आप कुछ न भी करना चाहें तो सिर्फ साक्षी भाव ही आपको निर्लिप्त कर सकता है। यही ज्ञान की शुरुआत है।किसी प्रसिद्ध योगी ने कहा था कि धार्मिक, वैज्ञानिक या फिर अन्य किसी धारणा से ग्रस्त मन जीवन या सृष्टि के सत्य को कभी नहीं जान पाता। वह अपने विचारों के ही वर्तुल में जीकर मर जाता है। संपूर्ण जीवन और सृष्टि विरोधाभाषी तत्वों का एक जाल है। इस जाल को जानने से ज्यादा महत्वपूर्ण स्वयं के साक्षीत्व को जाग्रत करना और स्वयं पर विश्वास करते हुए आगे बढ़ना। योग आपको स्वयं का गुरु बनाता है।