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विश्वास और संदेह से परे

- अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'

योग
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विश्वास संदेह की ओर ले जाता है और संदेह विश्वास की ओर। यह चक्र के समान है। बचपन से ही ईश्वर में विश्वास सिखाया जाता है तो यदि आप थोड़ा बहुत भी बुद्धि का इस्तेमाल करते हैं तो ईश्वर के प्रति आपमें संदेह जाग्रत हो ही जाएगा। और यदि बौद्धिकता के चलते आप नास्तिक बन गए हैं तो रुकिए एक ऐसा भी समय आएगा जबकि आपको ईश्वर की सत्ता को स्वीकारना पड़ेगा। यह है मन का कुचक्र।

'योग धर्म, आस्था और अंधविश्वास से परे है। योग एक सीधा विज्ञान है। प्रायोगिक विज्ञान है। योग है जीवन जीने की कला। योग एक पूर्ण चिकित्सा पद्धति है। एक पूर्ण मार्ग है-राजपथ। दरअसल धर्म लोगों को खूँटे से बाँधता है और योग सभी तरह के खूँटों से मुक्ति का मार्ग बताता है।'-ओशो

सवाल सिर्फ ईश्वर को मानने या नहीं मानने का नहीं बल्कि जिंदगी के हर फैसले में विश्वास और संदेह ही भूमिका होती है और यह सही भी होती है तथा गलत भी। इस विश्वास और संदेह करने वाली ‍बुद्धि को बदलकर योग यथार्थ को देखने की क्षमता के विकास को महत्व देता है।

आपको सत्य को जानना है या स्वस्थ रहना है, तो पतंजलि कहते हैं कि शुरुआत शरीर के तल से ही करना होगी। शरीर को बदलो मन बदलेगा। मन बदलेगा तो बुद्धि बदलेगी। बुद्धि बदलेगी तो आत्मा स्वत: ही स्वस्थ हो जाएगी। आत्मा तो स्वस्थ है ही। एक स्वस्थ आत्मचित्त ही सही विजन या समाधि को उपलब्ध हो सकता है।

संदेह और विश्वास का असर : इससे मस्तिष्क में द्वंद्व बना रहता है। सही और गलत कभी भी समझ में नहीं आता। जिनके मस्तिष्क में द्वंद्व है, वह हमेशा चिंता, भय और संशय में ही ‍जीते रहते हैं। उन्हें जीवन एक संघर्ष ही नजर आता है, आनंद नहीं। ऐसा व्यक्ति किसी भी प्रकार की बुरी आदतों का शिकार हो जाता है। वह कुतर्की भी होने लगता है।

संदेह और विश्वास से परे : योग से समस्त तरह की चित्तवृत्तियों का निरोध होता है- योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:। चित्त अर्थात बुद्धि, अहंकार और मन नामक वृत्ति के क्रियाकलापों से बनने वाला अंत:करण। चाहें तो इसे अचेतन मन कह सकते हैं, लेकिन यह अंत:करण इससे भी सूक्ष्म माना गया है।

योग विश्वास करना नहीं सिखाता और न ही संदेह करना। और विश्‍वास तथा संदेह के बीच की अवस्था संशय के तो योग बहुत ही खिलाफ है। योग कहता है कि आपमें जानने की क्षमता है, इसका उपयोग करो। आपकी आँखें हैं इससे और भी कुछ देखा जा सकता है, जो सामान्य तौर पर दिखता नहीं। आपके कान हैं, इनसे वह भी सुना जा सकता है जिसे आपने अभी तक सुना नहीं।

चित्त पर कब्जा : दुनिया के सारे धर्म इस चित्त पर ही कब्जा करना चाहते हैं, इसलिए उन्होंने तरह-तरह के नियम, क्रिया-कांड, ग्रह-नक्षत्र, किताब और ईश्वर के प्रति भय को उत्पन्न कर लोगों को अपने-अपने धर्म से जकड़े रखा है। पतंजल‍ि कहते हैं कि इस चित्त को ही खत्म करो। संदेह या विश्वास करने वाली इस प्रवृत्ति को ही खत्म करो तभी व्यक्ति शुद्ध और बुद्ध हो पाएगा।

यथार्थ समझ का लाभ : तटस्थ बुद्धि से शरीर और मन के संताप मिटते हैं। दोनों के संताप मिटने से ‍जीवन में शांति और स्वास्थ लाभ मिलता है। जीवन में लोगों, चिजों और स्वयं को समझने का सही मार्ग बनता है। क्रोध, लोभ, मोह और वासना का क्षय होता है। शरीर और मन में संयम का विकास होता है तथा इससे संयमित व्यवहार, वाणी और कार्य का जन्म होता है। अर्थात व्यक्ति मन, वचन और कर्म में समान और स्वयं के प्रति जिम्मेदार बनता है।

संदर्भ : पतंजल‍ि योग सूत्र, गीता एवं उपनिषद
लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें