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दमे से छुटकारा पाएँ

योग करें, जीवनशैली बदलें

Written By ND
Updated: मंगलवार, 28 सितम्बर 2010 (13:25 IST)
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आधुनिक अनुसंधान के आधार पर यह कहा जाता है कि दमा-एलर्जी बाह्य वातावरण, हवा में विजातीय द्रव्य कण, फंगस, ठंडी हवा, भोजन में कुछ पदार्थ, ठंडे पेय, धुएँ, मानसिक तनाव, इत्र और रजोनिवृत्ति जैसे अनेक कारणों से होकर व्यक्ति स्थायी रूप से दमा का रोगी हो जाता है। व्यक्ति की नाक, गला, त्वचा आदि पर इसका परिणाम एलर्जी कहलाता है।

आधुनिक चिकित्सक यह जानते हैं परंतु आंतरिक प्रक्रिया से अनभिज्ञ रहते हैं। आंतरिक बदलाव, व्यक्ति के शरीर की अतिसंवेदनशीलता का कारण उन्हें ज्ञात नहीं होता है। योगाभ्यासी इस रोग का कारण आंतरिक और गलत जीवनशैली को मानते हैं। योग की सभी प्रायोगिक विधाएँ जैसे आसन, प्राणायाम, शुद्धिकरण की क्रियाएँ, ध्यान आदि आंतरिक गड़बड़ियों को ठीक करने और समझने का अवसर प्रदान करती है।

एक अध्ययन में 20 से 45 वर्ष के 35 रोगियों को 45 मिनट का योगाभ्यास एक बार या सुबह-शाम करने का आग्रह किया गया था। रोगी यथाशक्ति अपना दैनिक कार्य करने के लिए स्वतंत्र थे। इन्हें रोग की तीव्रता के आधार पर दो समूहों में बाँटा था।

' अ' (मध्यम पीड़ा) और 'ब' (जटिल रोगी)। फेफड़ों की क्षमता 'पीक फ्लो' मीटर से नापकर वजन और पेट की परिधि को योग प्रशिक्षण के पूर्व नाप लिया गया था। दो सप्ताह तक दोनों समूहों को योगाभ्यास में प्रशिक्षित किया गया।

इसके तहत ब्रह्ममुद्रा 10 बार, कन्धसंचालन 10 बार (सीधे-उल्टे), मार्जगसन 10 बार, शशकासन 2 बार (10 श्वास-प्रश्वास के लिए), वक्रासन 10 श्वास के लिए, भुजंगासन 3 बार (10 श्वास के लिए), धनुरासन 2 बार (10 श्वास-प्रश्वास के लिए), पाश्चात्य प्राणायाम (10 बार गहरी श्वास के साथ), उत्तानपादासन 2 बार, 10 सामान्य श्वास के लिए, शवासन 5 मिनट, नाड़ीसांधन प्राणायाम 10-10 बार एक स्वर से, कपालभाँति 50 बार, भस्त्रिका कुम्भक 10 बार, जल्दी-जल्दी श्वास-प्रश्वास के बाद कुम्भक यथाशक्ति 3 बार दोहराना था।

रोगियों के फेफड़ों की क्षमता शुरुआत में औसतन 150 लि/मिमी थी और पेट का घेरा औसतन 36 इंच था। समूह 'अ' में फेफड़ों की क्षमता 1 वर्ष में 500 लि/मिमी होकर, पेट का घेरा औसतन आकार 34 इंच हो गया था। इसी प्रकार समूह 'ब' में फेफड़ों की क्षमता एक वर्ष के अभ्यास से 450 लि/मिमी एवं औसतन पेट का घेरा 36 इंच कम हो गया।

अध्ययन से यह ज्ञात हुआ कि योगाभ्यास के साथ जीवनशैली में बदलाव किए बिना योग से रोग निवारण संभव नहीं है। लोग योगाभ्यास करते हैं परंतु जीवनशैली में बदलाव नहीं करते और संपूर्ण लाभ से वंचित रह जाते हैं। योगाभ्यास और जीवनशैली में साधारण बदलाव से इस रोग का संपूर्ण निवारण संभव है। एक बार रोगी ठीक हो जाने के बाद योगाभ्यास छोड़ सकता है परंतु जीवनशैली को पूर्ववत करते ही पुन: रोगी हो सकता है क्योंकि रोग का मूल कारण जीवनशैली ही है।
- डॉ. बी.के. बांद्रे

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