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मृत्युंजय योग क्या है?

Updated: मंगलवार, 6 जून 2017 (17:15 IST)
जिस प्रकार महाभारत में अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश किया था, उसी प्रकार श्रीद्वारकापुरी में उद्धवजी को भी उपदेश प्रदान किया। उक्त उपदेश में कर्म, ज्ञान, भक्ति, योग आदि अनके विषयों की भगवान ने बड़ी ही विशद व्याख्या की है। अंत में योग का उपदेश हो जाने के बाद उद्धव ने भगवान से कहा कि प्रभो! मेरी समझ से आपकी यह योगचर्या साधारण लोगों के लिए दु:साध्य है अतएव आप कृपापूर्वक कोई ऐसा उपाय बतलाइए जिससे सब लोग सहज ही सफल हो सकें। तब भगवान ने उद्धव को भागवत धर्म बतलाया और उसकी प्रशंसा में कहा कि- 'अब मैं तुम्हें मंगलमय धर्म बतलाता हूं जिसका श्रद्धापूर्वक आचरण करने से मनुष्य दुर्जय मृत्यु को जीत लेता है। यानी जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिए छूटकर भगवान को पा जाता है। इसीलिए इसका नाम मृत्युंजय योग है।' भगवान ने कहा- 
 
मन के द्वारा निरंतर मेरे विचार और चित्त के द्वारा निरंतर मेरा चिंतन करने से आत्मा और मन का मेरे ही धर्म में अनुराग हो जाता है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि शनै:-शनै: मेरा स्मरण बढ़ाता हुआ ही सब कर्मों को मेरे लिए ही करे। जहां मेरे भक्त साधुजन रहते हों, उन पवित्र स्थानों में रहे और देवता, असुर तथा मनुष्यों में से जो मेरे अनन्य भक्त हो चुके हैं, उनके आचरणों का अनुकरण करें। अलग या सबके साथ मिलकर प्रचलित पर्व, यात्रा आदि में महोत्सव करे। यथाशक्ति ठाठ-बाट से गानवाद्य, कीर्तन आदि करे-कराएं। निर्मल चित्त होकर सब प्राणियों में और अपने आप में बाहर-भीतर सब जगह आकाश के समान सर्वत्र मुझ परमात्मा को व्याप्त देखे। इस प्रकार ज्ञान दृष्टि से जो सब प्राणियों को मेरा ही रूप मानकर सबका सत्कार करता है तथा ब्राह्मण और चांडाल, चोर और ब्राह्मण भक्त, सूर्य और चिंगारी, दयालु और क्रूर, सब में समान दृष्टि रखता है, वहीं मेरे मन से पंडित है। बारंबार बहुत दिनों तक सब प्राणियों में मेरी भावना करने से मनुष्य के चित्त से स्पर्धा, असूया, तिरस्कार और अहंकार आदि दोष दूर हो जाते हैं। अपनी दिल्लगी उड़ाने वाले घर के लोगों को 'मैं उत्तम हूं, यह नीच है'- इस प्रकार की देहदृष्टि को और लोकलाज को छोड़कर कुत्ते, चांडाल, गौ और गधे तक को पृथ्वी पर गिरकर भगवद्भाव से साष्टांग प्रणाम करे।
 
जब तक सब प्राणियों में मेरा स्वरूप न दिखे, तब तक उक्त प्रकार से मन, वाणी और शरीर के व्यवहारों द्वारा मेरी उपासना करता रहे। इस तरह सर्वत्र परमात्म बुद्धि करने से उसे सब कुछ ब्रह्ममय दिखने लगता है। ऐसी दृष्टि हो जाने पर समस्त संशयों का सर्वथा नाश हो जाए, तब उसे कर्मों से उपराम हो जाना चाहिए अथवा वह उपराम हो जाता है। हे उद्धव! मन, वाणी और शरीर की समस्त वृत्तियों से और चेष्टाओं से सब प्राणियों में मुझको देखना ही मेरे मत में सब प्रकार के मेरी प्राप्ति के साधनों में सर्वोत्तम साधन है। हे उद्धव! एक बार निश्चयपूर्वक आरंभ करने के बाद फिर मेरा यह निष्काम धर्म किसी प्रकार की विघ्न-बाधाओं से अणुमात्र भी ध्वंस नहीं होता, क्योंकि निर्गुण होने के कारण मैंने ही इसको पूर्णरूप से निश्‍चित किया है। हे संत! भय, शोक आदि कारणों से भागने, चिल्लाने आदि व्यर्थ के प्रयासों को भी यदि निष्काम बुद्धि से मुझ परमात्मा के अर्पण कर दे तो वह भी परम धर्म हो जाता है। इस असत् और विनाशी मनुष्य शरीर के द्वारा इसी जन्म में मुझ सत्य और अमर परमात्मा को प्राप्त कर लेने में ही बुद्धिमानों की बुद्धिमानी और चतुरों की चतुराई है। 
 
एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम्।
यत्सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति माऽमृतम्।। (श्रीमद्भाग. 11.29.22) 
 
अतएव जो मनुष्य भगवान की प्राप्ति के लिए कोई यत्न न करके केवल विषय-भोगों में ही लगे हुए हैं, वे श्रीभगवान के मत में न तो बुद्धिमान् हैं और न मनीषी ही हैं।
 
- कल्याण के दसवें वर्ष का विशेषांक योगांक से साभार 
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