रिश्तों की वो गरमाहट चली गई...






- फिरदौस खान


जिंदगी की जद्दोजहद ने इंसान को जितना मसरूफ बना दिया है, उतना ही उसे अकेला भी कर दिया है। हालांकि आधुनिक संचार के साधनों ने दुनिया को एक दायरे में समेट दिया है।



मोबाइल, के जरिए सात समंदर पार किसी भी पल किसी से भी बात की जा सकती है। इसके बावजूद इंसान बहुत अकेला दिखाई देता है। बहुत ही अकेला, क्योंकि आज के दौर में 'अपनापन' जैसे जज्बे कहीं पीछे छूट गए हैं। अब रिश्तों में वह नहीं रही, जो पहले कभी हुआ करती थी।
पहले लोग में रहा करते थे। पुरुष बाहर कमाने जाया करते थे और महिलाएं मिल-जुलकर घर-परिवार का कामकाज किया करती थीं। परिवार के सदस्यों में एक-दूसरे के लिए आदर-सम्मान और अपनापन हुआ करता था, लेकिन अब संयुक्त परिवार टूटकर एकल हो रहे हैं। महिलाएं भी कमाने के लिए घर से बाहर जा रही हैं। उनके पास बच्चों के लिए ज्यादा वक्त नहीं है।

बच्चों का भी ज्यादा वक्त घर से बाहर ही बीतता है। सुबह स्कूल जाना, होम वर्क करना, फिर ट्यूशन के लिए जाना और उसके बाद खेलने जाना। जो वक्त मिलता है, उसमें भी बच्चे या फिर कम्प्यूटर पर गेम खेलते हैं। ऐसे में न माता-पिता के पास बच्चों के लिए वक्त है और न ही बच्चों के पास अपने बड़ों के लिए है।

जिंदगी की आपाधापी में रिश्ते कहीं खो गए हैं शायद इसीलिए अब लोग परछाइयों यानी वर्चुअल दुनिया में रिश्ते तलाशने लगे हैं। लेकिन अफसोस! यहां भी वे रिश्तों के नाम पर ठगे जा रहे हैं। सोशल नेटवर्किंग साइट पर ज्यादातर प्रोफाइल फेक होते हैं या फिर उनमें गलत जानकारी दी गई होती है। झूठ की बुनियाद पर बनाए गए रिश्तों की उम्र बस उस वक्त तक ही होती है, जब तक कि झूठ पर पर्दा पड़ा रहता है। लेकिन जैसे ही सच सामने आता है, वह रिश्ता भी दम तोड़ देता है।

अगर किसी इंसान को कोई अच्छा लगता है और वह उससे उम्रभर का रिश्ता रखना चाहता है तो उसे सामने वाले व्यक्ति से झूठ नहीं बोलना चाहिए। जिस दिन उसका झूठ सामने आ जाएगा उस वक्त उसका रिश्ता तो टूट ही जाएगा, साथ ही वह हमेशा के लिए नजरों से भी गिर जाएगा। कहते हैं- 'इंसान पहाड़ से गिरकर तो उठ सकता है, लेकिन नजरों से गिरकर कभी नहीं उठ सकता।'

ऐसा भी देखने में आया है कि कुछ अपराधी प्रवृत्ति के लोग खुद को अति सभ्य व्यक्ति बताते हुए महिलाओं से दोस्ती गांठते हैं, फिर प्यार के दावे करते हैं। बाद में पता चलता है कि वे शादीशुदा हैं और कई बच्चों के बाप हैं। दरअसल, ऐसे बाप टाइप लोग हीनभावना के शिकार होते हैं। अपराधी प्रवृत्ति के कारण उनकी न घर में इज्जत होती है और न ही बाहर। उनकी हालत धोबी के कुत्ते जैसी होकर रह जाती है यानी धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का।

ऐसे में वे सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपना अच्छा-सा प्रोफाइल बनाकर खुद को महान साबित करने की कोशिश करते हैं। वे खुद को अति बुद्धिमान, अमीर और न जाने क्या-क्या बताते हैं, जबकि हकीकत में उनकी कोई औकात नहीं होती। ऐसे लोगों की सबसे बड़ी 'उपलब्धि' यही होती है कि ये अपने मित्रों की सूची में ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को शामिल करते हैं।

यदि कोई महिला अपने स्टेटस में कुछ भी लिख दे तो फौरन उसे 'लाइक' करेंगे, कमेंट्स करेंगे और उसे चने के झाड़ पर चढ़ा देंगे। ऐसे लोग समय-समय पर महिलाएं बदलते रहते हैं यानी आज इसकी प्रशंसा की जा रही है तो कल किसी और की। लेकिन कहते हैं न कि 'काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती।' वक्त-दर-वक्त ऐसे मामले सामने आते रहते हैं।





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