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हर जगह छाई हैं बेटियाँ
भारत में पहले और अब के परिवेश में महिलाओं की स्थिति में काफी अधिक सुधार आया है। यह सुधार सराहनीय है परंतु तब तक इसे पूरी तरह से सार्थक नहीं माना जा सकता है, जब तक इस देश की हर बेटी को परिवार व समाज द्वारा उसका अधिकार व अहमियत नहीं मिलती है। आज भी यदि हम भारत के ग्रामीण इलाकों की बात करें तो वहाँ आज भी अंधविश्वासों व कुरीतियों के चलते बेटियों की बलि दी जाती है तथा यदि वह इस अग्निपरीक्षा से बच जाती है तो उसे जीवनभर प्रताड़ित किया जाता है व कुल को कलंकित करने वाली कन्या के नाम से संबोधित किया जाता है। वर्तमान में टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले कई धारावाहिक भी नारी की इसी संघर्षमयी स्थिति को बयाँ कर रहे हैं। नारी एक ऐसा पात्र है, जिसके हर रूप पर कई कहानियाँ लिखी जा सकती हैं। इसका कारण यह है कि वह अलग-अलग किरदारों में हम सभी के जीवन से इस कदर जुड़ी है कि उसके बगैर सुखी जीवन की कल्पना ही व्यर्थ सी प्रतीत होती है। इन दिनों टेलीविजन पर प्रसिद्धि पा रहे अधिकांश धारावाहिकों की कहानी 'कन्या जीवन' के इर्द-गिर्द ही घूम रही है। किसी में नारी के कन्या रूप को बालविवाह, रीति-रिवाज व अशिक्षा जैसे पुराने ढकोसलों के बीच छटपटाता हुआ बताया है तो कहीं बेटियों के जन्म लेने को परिवार के लिए शुभ संकेत बताकर नारी के इस रूप को खुशियों का द्योतक बताया है। इस तरह इन धारावाहिकों में कन्या जीवन के विभिन्न पड़ावों की खूबसूरत झाँकियाँ चित्रित कर दर्शकों की वाहवाही बटोरी गई है। फिर चाहे वो धारावाहिक बालिका वधू, न आना इस देश में लाडो, अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो, मेरे घर आई एक नन्ही परी ... ही क्यों न हो।नारी मन की छटपटाहट व आजाद गगन में ऊँची उड़ान भरने की आशा ने मानो हमारे मन को झकझोरकर हमें नारी प्रगति की दिशा में सार्थक कदम उठाने पर विवश कर दिया है। यहीं कारण है कि 'बालिका वधू' की आनन्दी के दुख में हर नारी स्वयं को दुखी महसूस करती है व उसकी आँखों से निकले आँसू स्वत: ही उसकी भावनाएँ अभिव्यक्त कर देते हैं। नारी पर केंद्रित इन धारावाहिकों के पात्रों ने मानों हमारे दिलों में जगह बना ली है तथा हमें सब काम छोड़कर टेलीविजन के सामने आँखे गढ़ाए बैठने को विवश कर दिया है।यह सब ईश्वर की उस सुंदर कृति का ही कमाल है, जो अहसास बन हर पुरुष की रूह में शामिल है, जो प्यार बन दांपत्य जीवन को सुखमय बनाती है, जो चिंता की लकीरें बन सांझ ढलते ही हमारे जेहन में आ जाती है। इसकी चहल-पहल हर सूने आँगन को रौनक प्रदान करती है। सच कहें तो यही वो बेटियाँ हैं, जो अपनी काबिलियत से दुनिया पर छा जाने का जज्बा रखती है। बेटियाँ हमेशा प्रगति करें। इन्हीं कामनाओं के साथ देश की हर बेटी को मेरा सलाम!
लेखक के बारे में
गायत्री शर्मा