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जब हो आपकी विदाई

Written By WD
Updated: शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2009 (10:16 IST)
- प्रज्ञा गौतम

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विदाई एक बेहद संवेदनशील क्षण है। शायद मिलन के क्षण से भी ज्यादा। जिस तरह हम जिसे चाहते हैं उसके साथ पहली मुलाकात हमेशा याद रहती है। उसी तरह पहली विदाई भी हमेशा-हमेशा के लिए दिलोदिमाग में तस्वीर बनकर सुरक्षित रहती है।

विदाई शब्द सुनते ही ऐसा लगता है कि एक बेटी शादी के बाद अपनी नई जिंदगी में कदम रखने के लिए बाबुल के घर से विदा हो रही है। यह क्षण बेटी के लिए और उसके परिवार के लिए खासतौर से उसके पिता के लिए बेहद भावुक होता है।

ये पल अनमोल होते हैं। इन्हें कोई बेटी कभी नहीं भूल सकती। मगर कई बार विदाई के नाम से जेहन में बड़े नीरस, उबाऊ और एकांगी किस्म के चित्र भी उभरते हैं जो अक्सर हिन्दी फिल्मों द्वारा स्थापित किए गए होते हैं। मसलन प्रेमी-प्रेमिका की विदाई में प्रेमी अक्सर रेलवे प्लेटफार्म पर ट्रेन के साथ दौड़ता है।

ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली फिल्मों में प्रेमिकाएँ नायक को गाँव के बाहर कुएँ तक विदा करने आती हैं। विदाई का एक दृश्य माँ और बेटे के बीच भी हुआ करता है। माँ, हमेशा शहर जा रहे बेटे को विदा करते समय कुछ न कुछ उपदेश देती दिखाई जाती है...वगैरह-वगैरह।

विदाई के प्रभाव व्यापक होते हैं। एक दिन की गहराई से संवेदित विदाई टूटती हुई दोस्ती को बचा सकती है। दोस्ती को स्थायी बना सकती है या विदा ले रहे व्यक्ति के बारे में तय राय को बदल सकती है। इसलिए विदाई को पराई अभिव्यक्तियों से मत बाँधिए।
वैसे विदाई का क्षण अनंत संवेदनाओं वाला क्षण है। इस क्षण को कुछ निश्चित अभिव्यक्तियों में नहीं बाँधा जा सकता। न ही ऐसा कुछ किए जाने की कोशिश होनी चाहिए। हर एक के पास विदाई के लिए अपनी संवेदना, कल्पना और अभिव्यक्ति होनी चाहिए जो निश्चित ही रिओटाइप नहीं होगी।

मगर लोग अक्सर इस क्षण की उपेक्षा करते हैं। इसको उबाऊ और एकरस बना देते हैं जबकि इसके विपरीत जरूरत होती है इसे सकारात्मक और परिवर्तनकारी बनाने की।

हालाँकि किसी की भी विदाई फिर चाहे वह बेटा हो, बेटी हो, दोस्त हो या फिर कोई भी। विदाई के प्रभाव व्यापक होते हैं। एक दिन की गहराई से संवेदित विदाई टूटती हुई दोस्ती को बचा सकती है।

दोस्ती को स्थायी बना सकती है या विदा ले रहे व्यक्ति के बारे में तय राय को बदल सकती है। इसलिए विदाई को पराई अभिव्यक्तियों से मत बाँधिए। विदाई को एक मौलिक और अपना निजी कलात्मक अंदाज दीजिए। इस बारे में चाहे तो इन सुझावों से कुछ सीख ले सकते हैं :-

विदाई के समय ऐसे शब्दों का इस्तेमाल न करें जो आप कहना न चाहते हों। ध्यान रहे आप झूठ बोल सकते हैं पर आँखें कभी झूठ नहीं बोलती। विदा लेने वाले को मीठी यादों से विदा करें। वह कहीं आपकी कड़वी खटास अपने दिल में न ले जाए।

जरूरी नहीं है कि विदाई के समय अलंकारों से लदी-फदी भाषा का ही इस्तेमाल किया जाए या कि अनावश्यक रूप से वाचाल बनने की कोशिश की जाए। सीधी सपाट भाषा और कम शब्दों में भी विदाई यादगार हो सकती है। विदाई में बोले गए शब्दों से ज्यादा चेहरे के भाव महत्वपूर्ण होते हैं। आपके चेहरे से लगना चाहिए कि आप जो कुछ कह रहे हैं, वह दिल से कह रहे हैं। इस बात को कभी न भूलें कि चेहरा तब भी झूठ नहीं बोलता, जब आपके होंठ झूठ बोल रहे होते हैं।

कई बार शब्दों से ज्यादा प्रभाव मौन भाव-भंगिमाएँ डालती हैं। जैसे कसकर हाथ मिलाना, गर्मजोशी से सीने से लगा लेना, सीधे आँखों से देखना और आँखों ही आँखों में अलविदा कहना।

कई बार शब्दों में बाँधकर अपनी अभिव्यक्ति को सीमित न करें, गले लगाना या लग जाना ही बहुत है। अक्सर भावुक पिता अपनी पुत्रियों को औपचारिक विदा नहीं कर पाते। संवेदना के चरम क्षणों में पिता अपनी पुत्रियों को बस गले भर लगा लेते हैं।

विदा के अंतिम क्षणों में एकाएक दी गई कोई निशानी भी विदाई को रोमांचक और यादगार बना सकती है। मगर याद रखें कि ऐसी कोई निशानी योजना बनाकर न दें। योजना बनाएँ भी तो इतनी सफाई से कि वह हठात ही लगे।

संवेदनाओं से लबरेज विद ा ई का एक तरीका यह भी हो सकता है कि आम आपनी तमाम भावनाओं को एक कागज में लिख लें और वह कागज का पुर्जा बिछुड़ने के क्षणों में जिससे विदा ले रहे हैं उसे पकड़ा दें। विदा हमेशा दिल की गहराइयों से निकलती है। उसका असर हमेशा उद्वेलित करने वाला होता है। दिल की गहराइयों से दी गई विदा हमेशा याद रहती है।

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