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स्वास्थ्य क्षेत्र का हारावल दस्ता बनीं आशा वर्कर, UP में 1.60 लाख से ज्यादा संख्‍या

Updated: बुधवार, 1 जुलाई 2026 (20:44 IST)
National Rural Health Mission: हाल के वर्षों में आशा कार्यकर्ता (एक्रेडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट) भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ बनकर उभरी हैं। आशा कार्यकर्ता गांव की अपने ही समुदाय से चुनी जाती हैं और स्वास्थ्य सेवाओं को अंतिम छोर तक पहुंचाने का काम करती हैं। इन्हें "स्वास्थ्य क्षेत्र का हारावल दस्ता" इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं, बच्चों और पूरे परिवार की स्वास्थ्य सुरक्षा एवं जागरूकता के लिए सबसे आगे रहती हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत वर्ष 2005 में शुरू की गई यह योजना आज सामुदायिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में पूरी दुनिया के लिए एक सफल मॉडल बन चुकी है।
 

दो दशक का काम और कमाल

आशा कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत हुई। वर्ष 2006 से इनकी नियुक्ति और प्रशिक्षण शुरू हुआ तथा अगले कुछ वर्षों में इसे पूरे देश में लागू कर दिया गया। आज भारत में लगभग 10.5 लाख से अधिक आशा कार्यकर्ताएं कार्यरत हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता नेटवर्क माना जाता है। इनकी सबसे अधिक तैनाती ग्रामीण क्षेत्रों में है।
 
काम का तरीका : आशा कार्यकर्ता उसी गांव की 25 से 45 वर्ष आयु वर्ग की महिलाएं होती हैं। सामान्यतः उन्होंने कम से कम आठवीं या दसवीं तक शिक्षा प्राप्त की होती है। वे घर-घर जाकर स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता फैलाती हैं, गर्भवती महिलाओं की पहचान और पंजीकरण कराती हैं, प्रसवपूर्व जांच सुनिश्चित कराती हैं तथा लाभार्थियों को स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाने में मदद करती हैं।
 
मुख्य कार्य :

कोविड-19 महामारी में भी बनीं फ्रंटलाइन योद्धा

कोविड-19 महामारी के दौरान आशा कार्यकर्ताओं ने अग्रिम पंक्ति के योद्धा के रूप में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उन्होंने घर-घर सर्वेक्षण किया, संदिग्ध मरीजों की पहचान की, मास्क वितरण, होम आइसोलेशन की निगरानी, टीकाकरण के प्रति जागरूकता तथा लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

इनके काम से स्वास्थ्य क्षेत्र में क्या सुधार आया?

आशा कार्यक्रम ने देश के स्वास्थ्य संकेतकों में उल्लेखनीय सुधार किया है। वर्ष 2005-06 में संस्थागत प्रसव 40.8 प्रतिशत था, जो 2019-21 में बढ़कर 88.6 प्रतिशत हो गया। मातृ मृत्यु अनुपात वर्ष 2000 के आसपास 301 प्रति एक लाख जीवित जन्म था, जो 2020-22 में घटकर 93 प्रति एक लाख जीवित जन्म रह गया है। इसी प्रकार शिशु मृत्यु दर वर्ष 2005 में 58 प्रति 1000 जीवित जन्म थी, जो घटकर हाल के वर्षों में लगभग 26 प्रति 1,000 जीवित जन्म रह गई है।
 
विभिन्न अध्ययनों में पाया गया है कि जिन महिलाओं तक आशा कार्यकर्ताओं की नियमित पहुंच होती है, उनमें संस्थागत प्रसव, प्रसवपूर्व जांच तथा बच्चों के पूर्ण टीकाकरण की संभावना उल्लेखनीय रूप से अधिक होती है। कुल मिलाकर आशा कार्यकर्ताओं ने गरीब, ग्रामीण और हाशिए पर रहने वाले समुदायों को सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

उत्तर प्रदेश में आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका

उत्तर प्रदेश में लगभग 1.60 लाख से अधिक आशा कार्यकर्ता स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूत कड़ी के रूप में कार्य कर रही हैं। विशाल आबादी वाले इस राज्य में वे गांव-गांव जाकर गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण, टीकाकरण, संस्थागत प्रसव, नवजात एवं शिशु स्वास्थ्य, परिवार नियोजन, पोषण, टीबी, मलेरिया तथा अन्य राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों को लोगों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
 
प्रदेश के दूरदराज और वंचित क्षेत्रों में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को आम लोगों तक पहुंचाने में आशा कार्यकर्ताओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। चूंकि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की स्वास्थ्य और इससे जुड़ी सेवाओं और चुनौतियों की बहुत बेहतर समझ है,इसलिए वह अक्सर इनके सेवाओं की तारीफ भी करते हैं। राज्य सरकार ने हाल ही में विधानसभा में आशा कार्यकर्ताओं और आंगनवाड़ी कर्मियों के मानदेय व इंसेंटिव को चरणबद्ध तरीके से बढ़ाने के संकेत दिए हैं।
 
आशा कार्यकर्ता केवल स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि समुदाय को जागरूक और सशक्त भी बनाती हैं। "आशा" नाम अपने आप में सार्थक है—वे वास्तव में समाज के लिए आशा की किरण हैं। बेहतर प्रशिक्षण, समय पर प्रोत्साहन राशि, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान मिलने से उनका मनोबल और बढ़ेगा तथा देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था और मजबूत होगी। एक पंक्ति में कहें तो आशा कार्यकर्ताओं ने स्वयं को भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र का वास्तविक हारावल दस्ता सिद्ध किया है।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala 
लेखक के बारे में
गिरीश पांडेय
गिरीश पांडेय को विभिन्न मीडिया संस्थानों में तीन दशक से भी ज्यादा समय तक कार्य करने का अनुभव है। राजनीतिक, सामाजिक एवं समसामयिक मुद्दों पर इनकी गहरी पकड़ है। .... और पढ़ें

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