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ग़ालिब की ग़ज़ल : ख़ाक हो जाएँगे हम, तुमको ख़बर होने तक

Written By WD
Updated: शनिवार, 27 दिसंबर 2014 (12:41 IST)
आह को चाहिए इक उम्र, असर होने तक
कौन जीता है तिरी जुल्फ के सर होने तक

दामे हर मौज में है, हल्क़:-ए-सदक़ाम निहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे प' गुहर होने तक


आशिक़ी सब्र तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ, ख़न-ए-जिगर होने तक

हमने माना, कि तग़ाफुल न करोगे, लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम, तुमको ख़बर होने तक... 

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