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लतीफ़ा : ग़ालिब-आम पर नाम

गालिब के लतीफे

Written By WD
Updated: शुक्रवार, 2 मई 2008 (14:33 IST)
WD

एक रोज़ बादशाह चन्द मुसाहिबोँ के साथ आम के बाग ' हयात बख्श ' में टहल रहे थे- साथ में गालिब भी थे-

आम के पेडों पर तरह-तरह रंगबिरंगे आम लदे हुऎ थे- यहाँ का आम बादशाह और बेगमात के सवाय किसी को मोयस्सर नहीं आ सकता था-

गालिब बार बार आमोँ की तरफ गौर से देखते थे- बादशाह ने पूछा 'गालिब इस क़दर गौर से क्या देखते हो'-

गालिब ने हाथ बाँध कर अर्ज़ किया 'पीरोमुरशद, देखता हूँ कि किसी आम पर मेरा या मेरे घर वालों का नाम भी लिखा है या नहीं-

बादशाह मुस्कुराएँ और उसी रोज़ एक टोकरा आम गालिब के घर भेज दिए-

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कैसी उजर त
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गालिब के खास शागिर्द और दोस्त अक्सर शाम के वक़्त उनके पास जाते थे और मिर्ज़ा सुरूर के आलम में बहुत पुरलुत्फ बातें किया करते थे-

एक रोज़ मीर मेहदी मजरूह बैठे थे और मिर्ज़ा पलंग पर लेटॆ कराह रहे थे- मीर मेहदी पाँव दाबने लगे- ' मिर्ज़ा ने कहा

' भई तू सय्यद ज़ादा है मुझे क्यूँ गुनहगार करता है 'वोह नहीं माने और कहा' आपको ऎसा ही ख्याल है तो पैर दाबने की उजरत दे दीजिएगा' हाँ इसका मुज़ायक़ा नहीं- जब वो पैर दाब चुके तो उजरत तलब की- मिर्ज़ा ने कहा' भैया कैसी उजरत?

तुमने हमारे पाँव दाबे, हमने तुम्हारे पैसे दाबे-
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मेरा जूत ा
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एक दिन सय्यद सरदार मिर्ज़ा शाम को चले आए- जब थोड़ी देर रुक कर जाने लगे तो मिर्ज़ा खुद अपने हाथ में शमादान लेकर आए ताकि वह रोशनी में अपना जूता देख कर पहन लें- उन्होने कहा क़िबला ओ काबा, आपने क्यूँ तकलीफ फरमाई- मैं अपना जूता आप पहन लेता-

गालिब ने कहा मैं आपका जूता दिखाने को शमादान नहीं लाया, बल्कि इसलिए लाया हूँ कि कहीं आप मेरा जूता ना पहन जाएँ-

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