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ये हैं कचरों के खिलाड़ी

Updated: बुधवार, 1 अक्टूबर 2014 (15:14 IST)
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कीड़ों को मुँह में भर कर इधर से उधर रखना साहसिक नहीं घृणित कृत्य है। "खतरों के खिलाड़ी" जैसे रिअलिटी टीवी शो में ये सब किया जा रहा है। ये कार्यक्रम रात को उस समय आता है, जब लोग घरों में खाना खा रहे होते हैं।

चैनल उलटते-पलटते अगर कुछ सेकंड भी ये सीन दिख जाएँ, तो मन खराब हो जाता है। क्या शाकाहारी और क्या मांसाहारी, कोई भी इन्हें नहीं देख सकता। हमारे यहाँ के मांसाहारी लोग भी बहुत नजाकत वाले हैं। विदेशियों की तरह वे बहुत सारे समुद्री जीव नहीं खा सकते। न ही बहुत तरह का मांस खा सकते हैं।

कीड़े तो हमारे यहाँ किसी का भी आहार नहीं है। सो ऐसे दृश्य देखना बहुत ही तकलीफदेह है। इस तरह के घृणास्पद काम के लिए मालवा में एक स्थानीय शब्द इस्तेमाल किया जाता है - "सुगलापन"। खतरों के खिलाड़ी में यही सुगलापन हो रहा है, सो भी रात को खाने-पीने के समय।

हर संस्कृति का अपना एक मिजाज होता है। हमारी संस्कृति के लोग इस तरह की घृणास्पद चीज के जरिए अपना मनोरंजन नहीं कर सकते। रही बात कथित साहसिकता या स्टंट की, तो उसमें भी हमारी कोई रुचि नहीं है।

हमारा सबसे बड़ा साहसिक खेल जुआ है। जब दाँव पर पैसा लगा होता है, तो धड़कनें रुकने लगती हैं। कथित साहसिक खेलों में तो सुरक्षा साधन होते हैं और दुर्घटना के चांस बहुत कम होते हैं। जुए में तो पचास परसेंट रिस्क हमेशा ही रहता है। माल या तो जाएगा, या आएगा। इसके बीच में कुछ नहीं हो सकता। फिर हमारे यहाँ तो जुए का दाँव लगाकर बड़ा भारी युद्ध लड़े जाने जैसी परंपराओं का भी जिक्र मिलता है, वहाँ दूसरे खेलों की क्या बिसात?

लोगों को गलतफहमी है कि जुआरी जीतने के लिए खेलता है। कोई भी जुआरी जीतने के लिए नहीं खेलता, बल्कि उस रोमांच के लिए खेलता है, जो माल दाँव पर लगने से पैदा होता है। इसीलिए जुआरियों के दो तर्क होते हैं। जीतता हुआ जुआरी कहता है- अभी तो किस्मत साथ दे रही है, अभी कैसे खेलना बंद कर दूँ? हारने वाला जुआरी फरमाता है - अभी तो उठ ही नहीं सकता, बहुत पैसे हार गया हूँ। जुआ इतना रोमांचक खेल है कि कई फटेहाल लोग केवल दूसरों को खेलता देखकर ही सिहरन का आनंद लेते रहते हैं।

" खतरों के खिलाड़ी" सीजन वन भी कोई बहुत सक्सेस नहीं रहा था। टू भी मामूली ही था। अक्षय कुमार भी कुछ नहीं कर पाए थे। अब प्रियंका चोपड़ा कुछ टीआरपी बटोर पाएँगी, इसमें संदेह है।

इस शो के समय पर ही सोनी टीवी पर "एंटरटेनमेंट के लिए कुछ भी करेगा" आता है। लोग अनु मलिक और फराह खान की जोड़ी को देखना अधिक पसंद करते हैं, बनिस्बत प्रियंका चोपड़ा के।

कई बार कई विदेशी शो की नकल पर शो बना दिए जाते हैं। ये सोचकर कि वहाँ बहुत सफल था तो यहाँ भी रहेगा। मगर हर शो के साथ ऐसा नहीं होता। "इंडियन आइडल" तो खूब चला मगर "खतरों के खिलाड़ी" चल कर ही नहीं दे रहा।

ऐसे उतापे करेंगे तो चलने वाला भी नहीं है। ये कठपुतलियों का नाच देखने वालों का देश है। यहाँ खाना भले ही कभी-कभार कांटीनेंटल चल जाए पर मनोरंजन तो देसी ही चलता है।

लेखक के बारे में
दीपक असीम
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