जीवन गढ़ते हैं शिक्षक...

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मातृभाषा में शिक्षा का अपना ही मजा हुआ करता है। (आज हमारे नौनिहाल इस सुख से पूर्णतः वंचित कर दिए गए हैं) मातृभाषा में बोलते शिक्षक-शिक्षिकाएँ बनावटीपन से कोसों दूर अपनेपन के साथ सामने होते थे। वो अधिकार भरी डाँट, गलत हिज्जे लगाने पर दीदी (शिक्षिका) काकान उमेठना, गणित में पहाड़े याद न करने पर स्कूल की सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते पहाड़े याद करने की सजा मिलना...

कहने को भले ही ये सजाएँ हुआ करती थीं, पर मन में आक्रोश या मैल कभी न आ पाता था। हाँ, ग्लानि जरूर होती थी, शिक्षकों की अपेक्षाओं पर खरा न उतर पाने की। यहाँ तक कि स्कूल में सजा मिली यह मालूम पड़ने पर घर में भी शामत आ जाती थी। भले ही आज जैसी पेरेंट्स मीट नहीं हुआ करती थी, न फोन की सुविधा थी, मगर मास्टर साहब कभी भी घर आकर शिकायत या प्रशंसा करने का पूर्ण अधिकार रखते थे।

आज बच्चों को देखते हैं तो लगता है स्कूली दिनों में हम ज्यादा खुश, ज्यादा प्रसन्ना थे। भले ही स्कूलों का लंबा-चौड़ा तामझाम नहीं था, मगर सामान्य सुविधाओं में भी जीवन के प्रति उत्साह था, स्नेह था, सीखने-सिखाने की ललक थी।
  'हाँ, 'लीक' से हटकर चलने वाले शिक्षक सफल होते हैं... चाहे कुछ छात्रों को ही क्यों न हो, शिक्षा का सही अर्थ समझाने में वे सफल होते हैं। और देश और समाज के निर्माण में अपनी स्वस्थ ईंट रोपते हैं।'      


हिन्दी की शिक्षिका को मैं शायद ही भुला पाऊँ, जिन्होंने विषय को तो रुचि और परिश्रम से पढ़ाया ही, मगर नीति-व्यवहार संबंधी कितनी ही बातें सिखाईं, जो जीवन की पाठशाला में पग-पग पर मेरे काम आती रहीं। कोई भी प्रतियोगिता हो या समारोह... शिक्षक जी जान लड़ादेते थे। कोई भेदभाव नहीं, कोई परायापन नहीं, बस पूर्ण समर्पण और एकमेव जीत का लक्ष्य।

शिक्षक दिवस भी सारे तामझाम से दूर ही मनाया जाता था। सच्ची श्रद्धा से अभिभूत किए जाते थे शिक्षक... मुझे याद आता है, हमारे लिए एक विषय बागवानी का हुआ करता था। स्कूल के अहाते में छोटी-छोटी क्यारियाँ हर कक्षा को मिलती थीं। उसमें अपने मनपसंद फूलों के पौधे लगाते थे हम... और उन्हीं फूलों को अपने मनपसंद शिक्षकों को भेंट दिया करते थे। साथ में होता था अपने जेबखर्च से खरीदा रूमाल और माँ के हाथ की मिठाई।

समय बीता, बचपन की पाठशाला छूटी और जीवन की यथार्थ रंगशाला में पदार्पण करने के बाद लगा, कच्चे घड़े को पकाने-तराशने में शिक्षकों ने अमूल्य योगदान दिया है। विकट परिस्थितियों का सामना करने की हर कला सिखाई है उन्होंने और उन्हीं के कारण आज वक्त की आँधियों में भी उनके नौनिहाल तनकर खड़े हो पाते हैं।

वक्त ने करवट ली और कल के सामान्य विद्यालय आज के हाईटेक स्कूलों में बदल गए। बच्चे बच्चे न रहकर रेस के घोड़े बन गए, स्कूल मानो प्रशिक्षण का अहाता और शिक्षक रह गए ट्रेनर... बच्चा सफल तो ट्रेनर अच्छा, नहीं तो दूसरा ट्रेनर...। विकास के नाम पर चालू इस घुड़दौड़ में न तो आदर्शों की तालीम की जगह बची है, न आचार-व्यवहार सिखाने-समझाने का स्पेस...। सबकुछ एक तय सिलेबस के अनुसार 'टारगेट बेस्ड' होता है, जिसे हर कीमत पर पूर्ण करना ही होता है।

तीन घंटे में पेपर हल करना जो सिखा सके, वही अच्छा शिक्षक है। जो बच्चे को अच्छी रैंक दिला सके, वही अच्छा शिक्षक है... हाँ उसके पास अधिकार कोई नहीं है, बस कर्तव्यों की लंबी सूची है... अब ऐसे में जब संवाद के लिए कक्षा में स्थान ही नहीं बचता, कोई शिक्षक किसी बाल मन में अमिट छाप बनाए भी तो कैसे?

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- भारती पंडि
फिर भी लीक से हटकर काम करने वाले उन सभी शिक्षकों को नमन, जो अपनी लिमिटेशंस में भी संवाद का, संस्कारों के प्रस्फुरण का रास्ता ढूँढ ही लेते हैं। भीड़ में कुछ बच्चों को शिक्षकों के पाँव छूते देख यह विश्वास बलवती होता जाता है कि- 'हाँ, 'लीक' से हटकर चलने वाले शिक्षक सफल होते हैं... चाहे कुछ छात्रों को ही क्यों न हो, शिक्षा का सही अर्थ समझाने में वे सफल होते हैं। और देश और समाज के निर्माण में अपनी स्वस्थ ईंट रोपते हैं।'



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