कुंभ-मेला : धार्मिक अनुष्ठान का सांस्कृतिक महत्व

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-स्वामी वेदानंद

के नाम पर भारतवासी जितने मतवाले हो उठते हैं, उतने अन्य किसी में नहीं। समाज नीति में नहीं, राष्ट्रीय नीति में नहीं, राष्ट्रीय नीति पर नहीं और न अर्थ नीति पर। भारतवासी, राजा-प्रजा, धनी-दरिद्र, भद्र-अभद्र, पंडित-मूर्ख, गृहस्थ-वनवासी आदि सभी अपने धर्म के नाम पर भेदभाव और द्वंद्व भूल जाते हैं। समस्त विद्वेषों को क्षमा कर, एक क्षेत्र में, एक ही लक्ष्य को लेकर, एक ही उद्देश्य से सम्मिलित होते हैं।

मिलन के स्थान, काल और उद्देश्य
इसी कारण अनादिकाल से हम देखते आ रहे हैं कि इन भारतवासियों का मिलन स्थल न तो किसी दिग्विजयी राजा की राजधानी है और न कोई वाणिज्य-ऐश्वर्यशाली नगरी हैं। यह हैं पवित्र तीर्थस्थान समूह- गया, काशी, पुरी, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य, अयोध्या, वृंदावन, मथुरा, द्वारिका, हरिद्वार, नासिक, उज्जयिनी आदि। इस मिलन या सम्मेलन का समय न तो किसी राजनीतिक और न किसी सामाजिक कारण से निर्धारित हुआ है। इस सम्मेलन का उद्देश्य समस्याओं की मीमांसा की पूर्ति के लिए भी नहीं है। इसका उद्देश्य है कि व्यष्टि और समष्टि जीवन को धर्मादर्श के उच्च सिंहासन पर सुदृढ़ रूप में प्रतिष्ठित करना। धर्म की मृत संजीवनी से अनुप्रेरित कर, समाज और राष्ट्रीय जीवन के प्रत्येक स्तर को संचारित करते हुए उसे शाश्वत कल्याण में विमंडित करना।
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भारतवासियों का चरम लक्ष्य
यही वजह है कि प्रतिदिन सहस्र नर-नारी, आबाल वृद्ध-वनिता; तीर्थ-दर्शन, साधु-दर्शन, पुण्यार्जन तथा धर्मलाभ के लिए पवित्र कर्म करते हैं। सांसारिक हानियां, आत्मीय स्वजनों के विरोध तथा आपत्तियों एवं आर्तनाद की उपेक्षा करते हुए व्याकुल भाव से तीर्थयात्रा करने चले जाते हैं। भारतीय नर-नारी धर्म के लिए र्स्वस्व अर्पण कर सकते हैं, करते हैं, धर्म के लिए वे गृह, परिजन, आत्मीय-स्वजन, सुख-संभोग आदि के आकर्षणों की बगैर आसक्ति के उपेक्षा कर देते हैं। भारत का मूल मंत्र ही त्याग है। भारतवासी इसे जानते हैं, विश्वास करते हैं और अपने सामाजिक तथा व्यक्तिगत दैनिक जीवन के आचारनुष्ठान, छोटे-मोटे कार्यों में परिणत करते हैं- 'त्यागेकैनेके अमृत्वमानशु:'- एकमात्र त्याग के द्वारा ही अमृत्व की प्राप्ति होती है। भारत का निर्माण किन उपादानों से हुआ है- इसे अनुभव करें। 
 
भारत के राष्ट्रीय सम्मेलन की विशेषता
भारतीय कितने धार्मिक हैं, इसका सर्वोत्तम प्रमाण है-‍ विराट कुंभ मेला। भारतीयों के अलावा संसार की अन्य कोई जाति क्या इतने विशाल अनुष्ठान की कल्पना कर सकती है? विश्व के इतिहास में, किसी देश में किसी भी समय क्या ऐसा संभव हुआ है या होता है? जहां न उद्योक्ता हैं और न आह्वानकर्ता, संवाददाता नहीं, सभा नहीं, समिति नहीं, संचालक नहीं, जबकि इस समारोह में लाखों लोग जिनमें आबाल वृद्ध-वनिता-महाराज से लेकर राह के भिखारी तक आते हैं। वह भी एक-दो नहीं, महीनों कल्पवास करते हैं। इतना भेद, इतना वैचित्र्य, इतनी विषमता, कहीं देखने में नहीं आती। फिर भी कितनी शांति, कितनी प्रीति, कितना आनंद, कितना उत्साह, कैसी निष्ठा, कितनी सेवा, कितनी आत्मीयता, कितनी भक्ति, कितनी श्रद्धा और कैसी धर्मपरायणता रहती है। न हिंसा, न द्वेष और न घृणा। कष्ट को कष्ट नहीं समझते, दुख को दुख नहीं मानते। मृत्यु को भी परमानंद के साथ मुक्ति-लाभ समझते हुए सादर ग्रहण करते हैं!! यह मिलन, यह समन्वय यह शांति, यह सौहार्द- केवल भारत में ही संभव है। वह भी स्मरणातीत काल से क्या कोई बता सकता है कि किस आशा से, किस शक्ति से, किसे अवलंबन मानकर इतना विराट महामानव यज्ञ संभव हुआ है? वह यही धर्म है। 
भारत की प्राणशक्ति कहां है? 
इस नवयुग के संधिकाल में आज जो लोग देश की उन्नति के लिए, राष्ट्र के पुनरुत्थान करने के उद्देश्य से सामाजिक, राजनीतिक और अर्थनैतिक क्षेत्र में पाश्चात्य भाव और आदर्शों के आधार पर विविध आंदोलन करना चाह रहे हैं, परंतु देशवासियों की एकजुटता के अभाव के कारण विफल होकर सोच रहे हैं कि इस देश की, इस जाति की, अब कोई आशा नहीं है, a duing race- हमारा अनुरोध है कि वे एक बार आकर हमारे इस कुंभ मेले को अपनी आंखों से देखकर यह निश्चय करें कि यह जाति मृत है यह जीवित। यह जाति जीवन शक्ति से ओतप्रोत है। यह भी देखें कि भारत के प्राण कहां बसे हैं? जिस सूक्ष्म तंत्री में भारतवासियों का अखंड प्राण गुंथा हुआ है, उस तार को कोई स्पर्श नहीं कर सका है, ऐसी स्थिति में जाति के प्राणों में सुर का स्पंदन कैसे जगा सकते हैं? एक बार धर्म के उच्चतर आदर्शों का अनुष्ठान और प्रचार करने प्रवृत्त हों, धर्म की जड़ में सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन का निर्माण करने का प्रयत्न करें तो ज्ञात होगा कि समग्र भारत छत्रछाया में आ जाएंगे और इशारे पर उठेंगे-बैठेंगे। हृदय का प्रत्येक स्पंदन राष्ट्र की धमनियों में मूर्त रूप धारण कर रहा है। धर्म की नींव में ही समाज-राष्‍ट्र और जाति धीरे-धीरे एकता में आबद्ध होकर सुश्रृंखलित, तेजस्वी और वीर्यवान हो उठेंगे। 
 
कुंभ मेला एक अद्भुत समारोह है। भारत के कोने-कोने में इस धार्मिक मेले का आह्वान पहुंच जाता है और वहां से असंख्य नर-नारी आकुल भाव से इस धर्मामृत का आस्वादन करने चले आते हैं। 
नवशक्ति के प्रबल जागरण से राष्ट्र शक्ति की प्रत्येक धमनी में विशेष धर्म-धारा उद्दाम गति से प्रवाहित होने लगती है। भारत का उज्ज्वल भविष्य निश्चित है- इस पर विश्वास करें, अनुभव करें और सिंहस्थ में आकर दर्शन करें। 



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