सम्बंधित जानकारी
- Guru Arjan Dev : सिख धर्म के पांचवें गुरु, गुरु अर्जुन देव की जयंती
- मोदी पहुंचे शीशगंज गुरुद्वारा, गुरु तेगबहादुर के 400वें प्रकाश पर्व पर टेका माथा
- Guru Tegh Bahadur Jayanti 2021 : गुरु तेग बहादुर सिंह की जयंती
- Quotes by Guru Tegh Bahadur: जीवन को बदल देंगे गुरु तेग बहादुर सिंह के 18 अनमोल विचार
- क्या गुरुवार का दिन आपके लिए ठीक नहीं रहता, तो जानिए कारण (ज्योतिष के अनुसार)
Sikhism | सिख पंथ के प्रथम गुरु नानकदेवजी का जीवन परिचय
सिख धर्म के दस गुरुओं की कड़ी में प्रथम हैं गुरु नानकदेवजी। भारतीय संस्कृति में गुरु का महत्व आदिकाल से ही रहा है। कबीर साहब जी ने कहा था कि गुरु बिन ज्ञान न होए साधु बाबा। तब फिर ज्यादा सोचने-विचारने की आवश्यकता नहीं है बस गुरु के प्रति समर्पण कर दो। गुरु नानकदेव से मोक्ष तक पहुंचने के एक नए मार्ग का अवतरण होता है। इतना प्यारा और सरल मार्ग कि सहज ही मोक्ष तक या ईश्वर तक पहुंचा जा सकता है। आओ जानते हैं नानकदेवजी का संक्षिप्त जीवन परिचय।
1. गुरु नानकदेवजी का जन्म 15 अप्रैल 1469 को राएभोए की तलवंडी नामक स्थान में, कल्याणचंद (मेहता कालू या मेहता कालियान दास) नाम के एक हिन्दू किसान के घर गुरु नानकदेवजी का जन्म हुआ। उनकी माता का नाम तृप्ता था। तलवंडी को ही अब नानक के नाम पर ननकाना साहब कहा जाता है, जो पाकिस्तान में है।
2. 13 साल की उम्र में उनका उपनयन संस्कार हुआ और माना जाता है कि 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह सुलखनी से हुआ। 1494 में श्रीचंद और लक्ष्मीचंद नाम के दो पुत्र भी इन्हें हुए।
3. 1499 में उन्होंने अपना संदेश देना शुरु किया और यात्राएं प्रारंभ कर दी थी जबकि वे 30 साल के थे। 1521 तक इन्होंने भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के प्रमुख स्थानों का भ्रमण किया। कहते हैं कि उन्होंने चारों दिशाओं में भ्रमण किया था।लगभग पूरे विश्व में भ्रमण के दौरान नानकदेव के साथ अनेक रोचक घटनाएं घटित हुईं। उनकी इन यात्राओं को उदासियां कहा जाता हैं।
4. गुरु गुरुनानक देवी जी के चार शिष्य थे। यह चारों ही हमेशा बाबाजी के साथ रहा करते थे। बाबाजी ने अपनी लगभग सभी उदासियां अपने इन चार साथियों के साथ पूरी की थी। इन चारों के नाम हैं- मरदाना, लहना, बाला और रामदास। मरदाना ने गुरुजी के साथ 28 साल में लगभग दो उपमहाद्वीपों की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने तकरीबन 60 से ज्यादा प्रमुख शहरों का भ्रमण किया। जब गुरुजी मक्का की यात्रा पर थे तब मरदाना उनके साथ थे।
5. 22 सितंबर, 1539 को गुरुनानक देवजी ने अपना शरीर त्याग दिया। इससे उन्होंने अपने शिष्य भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया जो बाद में गुरु अंगद देव के नाम से जाने गए।
6. कहते हैं कि नानकदेवजी से ही हिंदुस्तान को पहली बार हिंदुस्तान नाम मिला। लगभग 1526 में जब बाबर द्वारा देश पर हमला करने के बाद गुरु नानकदेवजी ने कुछ शब्द कहे थे तो उन शब्दों में पहली बार हिंदुस्तान शब्द का उच्चारण हुआ था-
खुरासान खसमाना कीआ
हिंदुस्तान डराईआ।
7. नानकदेव क्या थे और नानक का दर्शन क्या था? ये सब निरर्थक बातें हैं। नानक के व्यक्तित्व में सभी गुण थे। नानकदेवजी ने रूढ़ियों और कुसंस्कारों के विरोध में सदैव अपनी आवाज बुलंद की। संत साहित्य में नानक अकेले चमकते सितारे हैं। कवि हृदय नानक की भाषा में फारसी, मुल्तानी, पंजाबी, सिंधी, खड़ी बोली, अरबी, संस्कृत और ब्रजभाषा के शब्द समा गए थे।
