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Shri Krishna 15 June Episode 44 : श्रीकृष्ण ने सुना वराह और नृसिंह अवतारों की कलाओं का वर्णन

अनिरुद्ध जोशी
सोमवार, 15 जून 2020 (22:10 IST)
निर्माता और निर्देशक रामानंद सागर के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 15 जून के 44वें एपिसोड ( Shree Krishna Episode 44 ) में सांदिपनि ऋषि प्रसन्न होकर उन्हें प्रभु श्रीहरि विष्णु के अवतारों की कथा सुनाते हैं। विष्णु के उस काल तक के हुए सभी अवतारों की वे क्रमश: कथा सुनाते हैं।
 
सबसे पहले वे भगवान विष्णु के वराह रूप की कथा सुनते हैं जिसमें वे हिरण्यकश्यप के भाई हिरण्याक्ष का माता पृथ्‍वी के उद्धार के लिए वध करते हैं। वराहरूपी भगवान विष्णु धरती को जल से बाहर निकालकर पुन: लोगों के रहने के लिए स्थान बनाते हैं।

रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा
 
हिरण्याक्ष की मृत्यु से उसके भाई हिरण्यकश्यप को बहुत दुख हुआ और उसने फिर यह तय कर लिया कि अब धरती पर न भगवान का कोई नाम रहेगा और न उनका जप करने वाला रहेगा। वह विष्णु और समस्त देवताओं से बदला लेने का संकल्प लेता है। फिर वह शुक्रचार्य के कहने पर शक्ति संचय करने के लिए तपस्या करने लगता है। 
ब्रह्माजी प्रकट होकर वरदान मांगने का कहते हैं तो वह कहता है कि आपके बनाए किसी भी प्राणी से मेरी मृत्यु ना हो, न मनुष्य से और न पशु से। न दैत्य से और न देवताओं से। न भीतर मरूं, न बाहर मरूं। न दिन में न रात में। न अस्त्र से मरूं और न शस्त्र से। न पृथ्‍वी पर न आकाश में। युद्ध में कोई भी मेरा सामना न करे सके। आपके बनाए हुए समस्त प्राणियों का मैं एकक्षत्र सम्राट हूं। ब्रह्मा कहते हैं तथास्थु।
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यह वरदान प्राप्त करके हिरण्यकश्यप धरती पर हाहाकर मचा देता है। विष्णु भक्तों पर अत्याचार प्रारंभ हो जाता है। बाद में उसे पता चलता है कि मेरा बेटा प्रहलाद ही विष्णु भक्त है तो वह उसे कई तरह से माने का प्रयास करता है। इस कथा में श्रीकृष्‍ण को सांदिपनि ऋषि भक्त प्रहलाद की कथा और नृसिंह अवतार लेकर विष्णु द्वारा हिरण्यकश्यप के वध की कथा को सुनाते हैं और श्रीहरि विष्णु की महिमा का वर्णन करते हैं।
 
सांदिपनी ऋषि कहते हैं कि भगवान के वराह और नृसिंह दोनों अवतारों को भगवान का आवेशावतार भी कहा जाता है। भगवान के अनेक अवतारों में 10 से लेकर 16 कलाएं प्रकट होती हैं। वराह और नृसिंह अवतार 10 से 11 कला पूर्ण थे। यह सुनकर श्रीकृष्‍ण कहते हैं कि प्रभु किसमें कितनी कलाएं हैं यह निर्णय का आधार क्या होता है? 
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सांदिपनी ऋषि कहते हैं कि प्राणी के अंतर में जो चेतन शक्ति है या प्रभु का तेजांश है उसी को कला कहते हैं। जिस प्राणी में जितनी चेतना शक्ति अभिव्यक्त हो रही है उतनी ही उसकी कलाएं मानी जाती हैं। इसीसे जड़ चेतन का भेद होता है। ये पेड़-पौधे एक कला के प्रणी हैं। इन्हें जल चाहिए। इन्हें सुख-दुख का आभास होता है। पशु-पक्षी चार कला के प्राणी है क्योंकि वे बुद्धि का प्रयोग कर सकते हैं।
 
आगे सांदिपनि ऋषि कहते हैं, साधारण मानव में पांच कला की और सभ्य तथा संस्कृति युक्त समाज वाले मानव में छह कला की अभिव्यक्ति होती है। जो विशेष प्रतिभावाले विशिष्ठ पुरुष होते हैं उनमें भगवान के तेजांश की सात कलाएं अभिव्यक्त होती। तत्पश्चात आठ कलाओं से युक्त वह महामानव संत और महापुरुष होते हैं जो इस धरती पर कभी-कभार दिखाई देते हैं। मनुष्य की देह आठ कलाओं से अधिक का तेज सहन नहीं कर सकती। नौ कला धारण करने के लिए दिव्य देह की आवश्यकता होती है। जैसे सप्तर्षिगण, मनु, देवता, प्रजापति, लोकपाल आदि। 
 
फिर ऋषि कहते हैं, इसके बाद 10 और 10 से अधिक कलाओं की अभिव्यक्ति केवल भगवान के अवतारों में ही अभिव्यक्त होती है। जैसे वराह, नृसिंह, कूर्म और मत्स्य अवतार। उनको आवेशावतार भी कहते हैं। उनमें प्राय: 10 से 11 कलाओं का आविर्भाव होता है। अब मैं तुम्हें उसी मत्स्य अवतार की कथा सुनाता हूं। जय श्रीकृष्णा।
 
रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा
 

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