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क्या कहती है शिव महापुराण की वायु संहिता (पूर्व और उत्तर भाग)

Updated: गुरुवार, 4 अगस्त 2016 (16:18 IST)
इस संहिता के दो भाग हैं। पूर्व और उत्तर। इन दोनों भागों में पाशुपत विज्ञान, मोक्ष के लिए शिव ज्ञान की प्रधानता, हवन, योग और शिव-ध्यान का महत्व समझाया गया है। शिव ही चराचर जगत् के एकमात्र देवता हैं।

शिव के 'निर्गुण' और 'सगुण' रूप का विवेचन करते हुए कहा गया है कि शिव एक ही हैं, जो समस्त प्राणियों पर दया करते हैं। इस कार्य के लिए ही वे सगुण रूप धारण करते हैं।

जिस प्रकार 'अग्नि तत्व' और 'जल तत्व' को किसी रूप विशेष में रखकर लाया जाता है, उसी प्रकार शिव अपना कल्याणकारी स्वरूप साकार मूर्ति के रूप में प्रकट करके पीड़ित व्यक्ति के सम्मुख आते हैं शिव की महिमा का गान ही इस पुराण का प्रमुख विषय है।
यह अवश्य पढ़ें 
 

शिव महापुराण : परिचय और 8 पवित्र संहिताएं 


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