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महिषासुर कौन था, जानिए उसकी कथा...

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016 (18:13 IST)
जेएनयू का 'महिषासुर' अब संसद तक पहुंच गया है। वामपंथी छात्रों ने जेएनयू में 2013 में महिषासुर शहादत दिवस मनाया था जिसमें देवी ‍दुर्गा का अपमान किया गया था। संसद में इस मुद्दे पर तीखा बवाल मचा हुआ है। जब केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने जेएनयू के पर्चे का संसद में उल्लेख किया तो विपक्ष ने हंगामा मचा दिया। स्मृति ने अपने भाषण में देवी दुर्गा के अपमान का मुद्दा उठाया था। आखिर कौन है यह महिषासुर जानिए, इसकी कहानी...

जिसने भी देवी दुर्गा का अपमान किया है उसे इसकी सजा जरूर मिलेगी। ऐसा कहा जाता है कि माता के गण अदृश्य रूप में विद्यमान रहते हैं। उनके गणों में भैरव और भैरवी प्रमुख हैं। माता दुर्गा के आगे हनुमान और पीछे भैरव की सवारी चलती है। वे लोग जिन्होंने कभी माता के बारे में जाना और समझा नहीं, वे उनके बारे में कुछ भी सोच सकते हैं। ऐसे लोग से कहना है कि वे हिम्मत दिखाएं किसी अन्य धर्म के देवता या पैगंबर के बारे में बोलने की।

इन 10 असुरों को जानिए...
 
भगवान शिव की चार पत्नियां थीं। पहली सती जो यज्ञ की आग में कूदकर भस्म हो गई। इसी माता सती ने पार्वती के रूप में नया जन्म लिया। फिर थीं उमा और काली। माता दुर्गा को सदाशिव की अर्धांगिनी कहा जाता है। उन्होंने ही मधु और कैटभ का वध किया था। उन्होंने ही शुम्भ और निशुम्भ का भी वध किया था। नवदुर्गा में से एक कात्यायन ऋषि की कन्या ने ही महिषासुर का वध किया था। उसका वध करने के बाद वे महिषसुर मर्दिनी कहलाई। 
 
कौन था महिषासुर? रम्भासुर का पुत्र था महिषासुर, जो अत्यंत शक्तिशाली था। इसकी उत्पत्ति पुरुष और महिषी (भैंस) के संयोग से हुई थी इसीलिए उसे महिषासुर कहा जाता था। उसने अमर होने की इच्छा से ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए बड़ी कठिन तपस्या की। ब्रह्माजी उसके तप से प्रसन्न हुए। वे हंस पर बैठकर महिषासुर के निकट आए और बोले- 'वत्स! उठो, इच्छानुसार वर मांगो।' महिषासुर ने उनसे अमर होने का वर मांगा।

ब्रह्माजी ने कहा- 'वत्स! एक मृत्यु को छोड़कर, जो कुछ भी चाहो, मैं तुम्हें प्रदान कर सकता हूं क्योंकि जन्मे हुए प्राणी का मरना तय होता है। महिषासुर ने बहुत सोचा और फिर कहा- 'ठीक है प्रभो। देवता, असुर और मानव किसी से मेरी मृत्यु न हो। किसी स्त्री के हाथ से मेरी मृत्यु निश्चित करने की कृपा करें।' ब्रह्माजी 'एवमस्तु' कहकर अपने लोक चले गए। 
 
वर प्राप्त करके लौटने के बाद महिषासुर समस्त दैत्यों का राजा बन गया। उसने दैत्यों की विशाल सेना का गठन कर पाताल लोक और मृत्युलोक पर आक्रमण कर समस्त को अपने अधीन कर लिया। फिर उसने देवताओं के इन्द्रलोक पर आक्रमण किया। इस युद्ध में भगवान विष्णु और शिव ने भी देवताओं का साथ दिया लेकिन महिषासुर के हाथों सभी को पराजय का सामना करना पड़ा और देवलोक पर भी महिषासुर का अधिकार हो गया। वह त्रिलोकाधिपति बन गया।
 
भगवान विष्णु ने कहा ने सभी देवताओं के साथ मिलकर सबकी आदि कारण भगवती महाशक्ति की आराधना की। सभी देवताओं के शरीर से एक दिव्य तेज निकलकर एक परम सुन्दरी स्त्री के रूप में प्रकट हुआ। हिमवान ने भगवती की सवारी के लिए सिंह दिया तथा सभी देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र महामाया की सेवा में प्रस्तुत किए। भगवती ने देवताओं पर प्रसन्न होकर उन्हें शीघ्र ही महिषासुर के भय से मुक्त करने का आश्वासन दिया।
 
भगवती दुर्गा हिमालय पर पहुंचीं और अट्टहासपूर्वक घोर गर्जना की। महिषासुर के असुरों के साथ उनका भयंकर युद्ध छिड़ गया। एक-एक करके महिषासुर के सभी सेनानी मारे गए। फिर विवश होकर महिषासुर को भी देवी के साथ युद्ध करना पड़ा। महिषासुर ने नाना प्रकार के मायिक रूप बनाकर देवी को छल से मारने का प्रयास किया लेकिन अंत में भगवती ने अपने चक्र से महिषासुर का मस्तक काट दिया। कहते हैं कि देवी कात्यायनी को ही सभी देवों ने एक एक हथियार दिया था और उन्हीं दिव्य हथियारों से युक्त होकर देवी ने महिषासुर के साथ युद्ध किया था।
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