आर्य, आर्यावर्त, हिन्दू और सनातन का रहस्य जानिए...

अनिरुद्ध जोशी|
आर्यों की जातियां : जो व्यक्ति वैदिक नियमों का पालन नहीं करता था उसे अनार्य माना जाता था। अनार्यों में कोल, चर्वाक और नास्तिक संप्रदाय का उल्लेख ज्यादा मिलता है। खैर...
दरअसल, प्रारंभिक सभ्यताएं हिमालय से निकलने वाली नदियों के पास ही निवास करती थी। हिमालय के दक्षिण में बहने वाली नदियों में प्रमुख सिंधु, सरस्वती, गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र को प्रमुख माना गया है जिनकी हजारों सहायक नदियां हैं। इसके अलावा भारतवर्ष में नर्मदा, गोदावरी और महानदी को प्रमुख स्थान प्राप्त है। फिर गोमती, कृष्णा, कावेरी और ताप्ती आदि का उल्लेख मिलता है।
 
इन नदियों के तटों पर कुरु, पांचाल, पुण्ड्र, कलिंग, मगध, दक्षिणात्य, अपरान्तदेशवासी, सौराष्ट्रगण, तहा शूर, आभीर एवं अर्बुदगण, कारूष, मालव, पारियात्र, सौवीर, सन्धव, हूण, शाल्व, कोशल, मद्र, आराम, अम्बष्ठ, शाक्य और पारसी गण रहते हैं। इसके पूर्वी भाग में किरात और पश्चिमी भाग में यवन बसे हुए हैं। अनंत (शेष), वासुकी, तक्षक, कार्कोटक और पिंगला- उक्त पांच नागों के कुल के लोगों का भारत में वर्चस्व था। यह सभी कश्यप वंशी थे और इन्ही से नागवंश चला। यह सभी आर्य थे।
 
महाभारत अनुसार में प्राग्ज्योतिष (असम), किंपुरुष (नेपाल), त्रिविष्टप (तिब्बत), हरिवर्ष (चीन), कश्मीर, अभिसार (राजौरी), दार्द, हूण हुंजा, अम्बिस्ट आम्ब, पख्तू, कैकेय, गंधार, कम्बोज, वाल्हीक बलख, शिवि शिवस्थान-सीस्टान-सारा बलूच क्षेत्र, सिंध, सौवीर सौराष्ट्र समेत सिंध का निचला क्षेत्र दंडक महाराष्ट्र सुरभिपट्टन मैसूर, चोल, आंध्र, कलिंग तथा सिंहल सहित लगभग 200 जनपद महाभारत में वर्णित हैं, जो कि पूर्णतया आर्य थे या आर्य संस्कृति व भाषा से प्रभावित थे। इनमें से आभीर अहीर, तंवर, कंबोज, यवन, शिना, काक, पणि, चुलूक चालुक्य, सरोस्ट सरोटे, कक्कड़, खोखर, चिन्धा चिन्धड़, समेरा, कोकन, जांगल, शक, पुण्ड्र, ओड्र, मालव, क्षुद्रक, योधेय जोहिया, शूर, तक्षक व लोहड़ आदि आर्य खापें विशेष उल्लेखनीय हैं।
 
मलेच्छ और यवन लगातार आर्यों पर आक्रमण करते रहते थे। हालांकि ये दोनों ही आर्यों के कुल से ही थे। आर्यों में भरत, दास, दस्यु और अन्य जाति के लोग थे। वेदों में उल्लेखित पंचनंद अर्थात पांच कुल के लोग ही यदु, कुरु, पुरु, द्रुहु और अनु थे। इन्हीं में से द्रहु और अनु के कुल के लोग ही आगे चलकर मलेच्छ और यवन कहलाए।
 
16 महाजनपद : बाद में महाभारत के अनुसार भारत को मुख्‍यत: 16 महाजनपदों में स्थापित किया गया। जैन 'हरिवंश पुराण' में प्राचीन भारत में 18 महाराज्य थे। पालि साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथ 'अंगुत्तरनिकाय' में भगवान बुद्ध से पहले 16 महाजनपदों का नामोल्लेख मिलता है। इन 16 जनपदों में से एक जनपद का नाम कंबोज था। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार कंबोज जनपद सम्राट अशोक महान का सीमावर्ती प्रांत था। भारतीय जनपदों में राज्याणि, दोरज्जाणि और गणरायाणि शासन था अर्थात राजा का, दो राजाओं का और जनता का शासन था।
 
*राम के काल 5114 ईसा पूर्व में नौ प्रमुख महाजनपद थे जिसके अंतर्गत उप जनपद होते थे। ये नौ इस प्रकार हैं- 1.मगध, 2.अंग (बिहार), 3.अवन्ति (उज्जैन), 4.अनूप (नर्मदा तट पर महिष्मती), 5.सूरसेन (मथुरा), 6.धनीप (राजस्थान), 7.पांडय (तमिल), 8. विन्ध्य (मध्यप्रदेश) और 9.मलय (मलावार)।
 
*16 महाजनपदों के नाम : 1.कुरु, 2. पंचाल, 3. शूरसेन, 4.वत्स, 5. कोशल, 6. मल्ल, 7. काशी, 8. अंग, 9. मगध, 10. वृज्जि, 11. चे‍दि, 12. मत्स्य, 13.अश्मक, 14.अवंति, 15.गांधार और 16. कंबोज। उक्त 16 महाजनपदों के अंतर्गत छोटे छोटे अनेक जनपद होते थे। इन जनपदों में अनेक जा‍ति के लोग कहते थे जिनमें से अधिकतर खुद को आर्य ही कहते थे आर्यों के विपरित को कोल संप्रदाय का माना जाता था।
 
अगले पन्ने पर क्या आर्य और द्रविढ़ एक ही हैं...
 



और भी पढ़ें :